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एक तरही ग़ज़ल - "हवा के रुख पे चलती किश्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं" ( गिरिराज भंडारी )

1222       1222      1222      1222

पहन रख पैरहन, उरियानियाँ अच्छी नहीं लगतीं

कि बद को भी, कभी बदनामियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

फसादी हो अगर, तो बोलियाँ अच्छी नहीं लगतीं

वहीं बेवक़्त की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके 

कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं

 

भरम रख़्ख़ें वे मौसम का , कहे कोई उन्हें जा कर

कभी बे वक़्त छाई बदलियाँ, अच्छी नहीं लगतीं 

चला आया है जुगनू देखिये फिर रोशनी ले कर

इसे तारीक़ हो गर बस्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं

ये जीवन है , यहाँ पर जीत भी है हार भी यारों

मगर हर वक़्त की नाकामियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

उमर पाके बुज़ुर्गों सी , कहोगे तुम भी इक दिन ये

कि सच हो बात, नाफरमानियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

अगर हो ताब ,हो जिगरा तो बोलो ज़ोर से यारों

ये पीछे पीठ, कानाफूसियाँ अच्छी नहीं लगतीं

 

कटें पतवार से लहरें मज़ा कुछ और आता है

"हवा के रुख पे चलती किश्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं"

************************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

 

Views: 933

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 19, 2015 at 12:12pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , गज़ल को आपकी सहमति , आपकी सराहना मिली , गज़ल कहना सार्थक हुआ , आपका हार्दिक आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2015 at 12:06pm

खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके 

कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं

बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है आ० भाई गिरिराज जी ,कोटि कोटि बधाई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 7:52am

आदरणीया राज्श जी , आपकी सराहना मिली , रचना कर्म सार्थक हुआ ! सराहना के लिये आपका बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 7:50am

आदरणीय राहुल भाई , सराहना के लिये आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 7:49am

आदरणीय मदन मोहन भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 7:49am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपका आशीष मिला , मन प्रसन्न हुआ , सदा ऐसे ही आशीष बरसाते रहें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 18, 2015 at 7:47am

आदरणीय श्याम नारायण भाई , सराहना के लिये आपका  हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 17, 2015 at 12:19pm

वाह्ह्ह्ह वाह्ह्ह बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आ० गिरिराज जी ,

खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके 

कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं----कमाल 

चला आया है जुगनू देखिये फिर रोशनी ले कर

इसे तारीक़ हो गर बस्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं---जबरदस्त 

मुझे ये ग़ज़ल बहुत पसंद आई ..ढेरों दाद कबूल कीजिये 

 

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 17, 2015 at 11:24am
आदरणीय उम्दा! हर इक शे'र लाजवाब ! वाह वाह वाह!
Comment by Madan Mohan saxena on January 16, 2015 at 3:38pm

वाह , बहुत खूब ग़ज़ल कही है बधाई

खुला आकाश हो सबका ,परों मे ताब हो सबके
कफस अंदर की ये आज़ादियाँ, अच्छी नहीं लगतीं

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