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" मिल गया चैन तुमको , हो गयी तसल्ली " , उसके पिता खुद को संभाल नहीं पा रहे थे | " कितनी बार मना किया था कि उसे वहां मत भेजो , अब खो दिया न उसको "| बेटी की असमय मौत ने उनको तोड़ दिया था |
टूट तो मैं भी गयी थी लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बेटी को उसकी मर्ज़ी की जगह नौकरी करने की वकालत करके मैंने कौन सा गुनाह कर दिया था | उसकी कही बात जेहन में घूम रही थी " जाना तो एक दिन सब को है माँ , तो क्यों न निडर होके अपने तरीके से जिया जाए | अपना आसमाँ खुद ढूंढा जाए "| बेहद मुश्किल था अब लेकिन मुझे सम्भालना था , खुद को भी और परिवार को भी | शायद बेटी की आत्मा के आसमाँ के लिए |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 19, 2015 at 5:28pm

बहुत बहुत आभार  जितेन्द्र पस्टारियाji.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 19, 2015 at 5:14pm

मन में कई सवाल खड़े करती हुई ,लघुकथा. जो एक नजर से सकारात्मक भी ,तो दूसरी में नकारात्मक. बहुत-२ बधाई आदरणीय विनय जी

Comment by विनय कुमार on January 19, 2015 at 2:26am

बहुत बहुत आभार सोमेश कुमार जी..

Comment by somesh kumar on January 18, 2015 at 11:48pm

सुंदर लघुकथा |अंतर-वेदना को प्रकाश प्रदान करती और बेटी की आत्मा का आसमां देती बहुत ही सुंदर लघुकथा |

Comment by विनय कुमार on January 18, 2015 at 12:09pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय हरी प्रकाश दुबेजी |

Comment by Hari Prakash Dubey on January 18, 2015 at 5:11am

आदरणीय विनय जी शुभकामनायें इस लघुकथा पर !

Comment by विनय कुमार on January 17, 2015 at 9:13pm

बहुत बहुत आभार अलोक मित्तल जी..

Comment by Alok Mittal on January 17, 2015 at 4:17pm

अपना आसमाँ खुद ढूंढा जाए "|......

सुंदर लघु कथा आपकी

Comment by विनय कुमार on January 16, 2015 at 9:58pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी | 

Comment by विनय कुमार on January 16, 2015 at 9:57pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी | भय के चलते ही बच्चों को उनका जहाँ चुनने की आज़ादी नहीं देना क्या उचित है ?

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