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" आप बस एक बार कह दो कि ये उन लोगों ने किया है , बाक़ी तो हम देख लेंगे " , मोहल्ले के तथाकथित धर्म गुरु काफी आवेश में थे | मौका अच्छा था और तमाम लोग इंतज़ार में थे इसका फायदा उठाने के लिए |
चच्चा सर झुकाये बैठे थे , चेहरा आँसुओं से तराबोर था | उनकी तो दुनिया ही मानो उजड़ गयी थी , जवान बेटे को खो चुके थे | लेकिन धीरे से सर उठा कर बोले " क़ातिल का कोई मज़हब नहीं होता "|

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on February 3, 2015 at 5:55pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शरदिंदु मुख़र्जी जी ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on February 3, 2015 at 5:20pm
अवाक कर देने वाली रचना, ..... अपने तीक्ष्ण वक्तव्य से अभिभूत करती हुई...सादर
Comment by विनय कुमार on January 15, 2015 at 10:38am

बहुत बहुत आभार आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on January 15, 2015 at 9:35am

बेहतरीन समीचीन उदाहरण 

Comment by विनय कुमार on January 14, 2015 at 7:27pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी..

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 14, 2015 at 6:52pm

वाह सर वाह अवसर वादियों का सही चित्रण .........

Comment by विनय कुमार on January 14, 2015 at 5:55pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय अमन कुमार जी..

Comment by विनय कुमार on January 14, 2015 at 5:54pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सोमेश कुमार जी..

Comment by aman kumar on January 14, 2015 at 5:13pm

 एक समाचीन कथा ,

सुन्दर !

Comment by somesh kumar on January 14, 2015 at 3:23pm

कातिल का कोई मजहब नहीं होता ,खुबसुरत रचना 

कृपया ध्यान दे...

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