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" बहुत बहुत बधाई जन्मदिन की, आज तो पार्टी बनती है " , ऑफिस पहुँचते ही सहकर्मियों ने घेर लिया शर्माजी को | एक बारगी तो वो सोच ही नहीं पाये कि कैसे प्रतिक्रिया दें इस पर , उनसठवां जन्मदिन था उनका | अगले साल सेवानिवृत्त हो जायेंगे और घर में बेरोज़गार पुत्र एवम शादी के योग्य पुत्री |
चेहरे पे फीकी मुस्कान लाते हुए सबका आभार व्यक्त करने लगे और आवाज लगायी " सबके लिए नाश्ते का इंतज़ाम आज मेरी तरफ से कर देना भोला " | सब प्रसन्न थे पर उनके मन में यही चल रहा था कि ऐसा जन्मदिन किसी का न हो |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 14, 2015 at 12:37pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय राजेश कुमारी जी..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 14, 2015 at 11:20am

कई बार मन मारकर हालात से समझौता करना पड़ता है दिल में गम मुख पर हँसी जिन्दगी बहुत कुछ करवाती है ,बहुत बढ़िया विषय पर लिखी है लघु कथा बहुत- बहुत बधाई. 

Comment by विनय कुमार on January 13, 2015 at 10:55pm

बहुत बहुत आभार प्रतिभा त्रिपाठी जी |  

Comment by pratibha tripathi on January 13, 2015 at 9:36pm

आदरणीय विनय जी आपकी लघुकथा जाने कितने घरों का सच है कथा एसी थी की उनसभी बेचारे लोगों की व्यथा पर दुख होता है जो अपने जीवन के एक पड़ाव पर थक गए किन्तु उनके कर्म और कर्तव्यों को विराम नहीं मिलता । 

बहुत खूब  

Comment by विनय कुमार on January 13, 2015 at 12:56pm

बहुत बहुत आभार गुमनाम पिथौरागढ़ीजी ..

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 12, 2015 at 8:40pm
वाह क्या खूब है ........... मनोभावों का सफल चित्रण किया है सर बधाई
Comment by विनय कुमार on January 12, 2015 at 5:26pm

बहुत बहुत आभार हरी प्रसाद दुबे जी..

Comment by Hari Prakash Dubey on January 12, 2015 at 5:10pm

सुंदर लघुकथा, हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी....आज तो पार्टी बनती है " . !

Comment by विनय कुमार on January 12, 2015 at 3:53pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी लघुकथा पर दृष्टि डालने हेतु | 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 12, 2015 at 3:48pm

आदरणीय विनय कुमार सिंहजी, आपकी दृष्टि के पैनेपन पर मैं मुग्ध हूँ. जिस विन्दु को आपने अपनी लघुकथा का कथ्य बनाया है, वह सार्वभौमिक है. ऐसे कार्यालयी वातावरण में अक्सर ऐसा होता है. पृष्ठभूमि तथा वर्तमान के सच जब दो सिरों पर दिखें तो ऐसी घड़ियाँ अवश्य भारी पड़ती हैं. 
लघुकथा में नायक के मानसिक घूर्णन को यथासम्भव शब्द मिले हैं.
शुभकामनाएँ.

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