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"बाबू, बाबू" , बाबा के मुंह अस्पष्ट सी आवाजें निकल रही थीं | वो अब धीरे धीरे अपनी ऑंखें खोलने का प्रयास कर रहे थे | खून अभी भी उनकी कलाईयों में चढ़ रहा था और मैं उनके सिरहाने बैठा उनको सहला रहा था |
मुझे सुबह का घटनाक्रम याद आ गया जिसके चलते उनको चोट लगी थी | मैं उनका लाडला पोता था और मुझे वो हमेशा बाबू ही बुलाते थे | मैं कल ही गांव आया था और आज मुझसे मिलने गांव के कई लोग आ गए | उसी बीच एक दलित लड़का आ कर दरवाजे पर पड़ी खाट पर बैठ गया | बाबा ने कभी भी दलितों को बराबर नहीं समझा था , शायद यह उनकी पीढ़ी की सोच थी | जबकि हम लोग इन चीजों के सख्त विरोधी थे और बाबा को समझाने की असफल चेष्टा करते रहते थे | बाबा का तो गुस्से के मारे बुरा हाल हो गया और उन्होंने उसे दौड़ा लिया | फिर ठोकर लगी और वो बेहोश हो गए | तुरंत उनको हस्पताल ले आया गया वर्ना कुछ भी हो सकता था |
उम्र भी काफी हो गयी थी उनकी और शरीर में रक्त की कमी भी | उन्हें ख़ून की सख्त जरुरत थी और मैं बीमारी की वजह से दे नहीं सकता था | तभी साथ आये गांव के मेरे दलित दोस्त ने आगे बढ़कर अपना खून दे दिया |
बाबा जब होश में आ गए तो मैंने उनको प्यार से बताया कि उनकी धमनियों में फिलवक्त दौड़ रहा खून उसी व्यक्ति का है जिनको उन्होंने कभी भी बराबर नहीं समझा | अब उनके चेहरे पर तमाम भाव आ जा रहे थे | शायद जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उनकी सोच को भी नया जीवन मिल रहा था |
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on January 5, 2015 at 4:38pm

बहुत बहुत आभार शरदिंदु मुख़र्जी जी..

Comment by विनय कुमार on January 5, 2015 at 4:37pm

बहुत बहुत आभार मिथिलेश वामनकर जी..

Comment by विनय कुमार on January 5, 2015 at 4:37pm

बहुत बहुत आभार डॉ गोपाल नारायण जी ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on January 4, 2015 at 8:35pm

आदरणीय विनय जी, रचना विषयवस्तु और विचारों की दृष्टि से प्रशंसनीय है. शुभकामनाएँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 4, 2015 at 7:22pm
आदरणीय विनय कुमार सिंह जी सफल लघुकथा हेतु हार्दिक बधाई।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 4, 2015 at 6:52pm

विनय जी

आपने  विषय का चुनाव बहुत अच्छा किया है i  कथा  प्रभावित करती है i

Comment by विनय कुमार on January 4, 2015 at 4:12pm

बहुत बहुत आभार Hari Prakash Dubeyji..

Comment by Hari Prakash Dubey on January 4, 2015 at 3:08pm

शायद जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उनकी सोच को भी नया जीवन मिल रहा था |....बढ़िया प्रयास , इस रचना  के लिए हार्दिक बधाई , विनय जी !

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