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वेंटिलेटर (लघुकथा)

“सुनिए , जरा प्याज काट दीजिये । ”

“देख नहीं रही हो , अभी-अभी थक हार के घर लौटा हूँ ।”

अरे….मैं भी तो आज 5 बजे दफ्तर से आयीं हूँ ।

“हाँ तो कौन सा पहाड़ खोद कर आई हो ।”

“तो तुम ही कौन सा लोहा पिघला रहे थे ?”

“इतना सुनते ही पति ने चप्पल उठा के पत्नी के मुहँ पर दे मारी, पत्नी तमतमा कर आई और पास ही पड़ा जूता उठा कर पति के मुहँ पर जड़ दिया ।”

इधर खबर आ रही थी.. “अभी –अभी , वेंटिलेटर पर पड़ी भारतीय संस्कृति ने दम तोड़ दिया ।”  

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”  

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 4:55pm

आदरणीय अनूराग गोयल जी ,आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 3, 2015 at 9:24pm

आदरणीय खुर्शीद जी बहुत बहुत आभार आपका ! सादर  

Comment by Anurag Goel on February 3, 2015 at 7:03pm

ये प्रहार है हमारी दम तोड़ती भारतीय सभ्यता पर , जहाँ आधुनिकीकरण के नाम पर महिलाओं को पुरुषों के खिलाफ भड़काया जाता है और पुरुषों को महिलाओं की बेइज़्ज़ती करने में मर्दानगी नज़र आती है. सुन्दर प्रस्तुति 

Comment by khursheed khairadi on February 3, 2015 at 9:26am

आदरणीय हरी प्रकाश सर ,वाकई भारतीय संस्कृति वेंटिलेटर पर अंतिम सांसे गिन रही है |सटीक व्यंग्य |सादर अभिनन्दन |

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 7:57pm

जी सर .. पुनः प्रयास करता हूँ ! सादर  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 30, 2015 at 7:55pm

//आपके सुझाव के अनुसार शीर्षक परिवर्तन कर रचना पुनः प्रस्तुत है कृपया एक बार पुनः दृष्टी डाल दीजियेगा//

पहले शीर्षक था ...दम तोड़ दिया.

अब ....

भारतीय संस्कृति ने दम तोड़ दिया.

कुछ कहते नहीं बन रहा भाई जी, शीर्षक लघुकथा का है या टीवी पर चल रहे ब्रेकिंग न्यूज़ ....

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 7:54pm

आदरणीय मिथिलेश जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! आपकी सलाह पर फॉण्ट साइज़ बदल दिया और आदरणीय योगराज सर की कृपा  भी हो गयी ! सादर 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 7:51pm

सोमेश भाई आपका ह्रदय से आभार ! 

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 7:47pm

आदरणीय Er. Ganesh Jee "Bagi सर, रचना पर आपकी उपस्तिथि ही उत्साहवर्धक है, आपके सुझाव के अनुसार शीर्षक परिवर्तन कर रचना पुनः प्रस्तुत है कृपया एक बार पुनः दृष्टी डाल दीजियेगा, हार्दिक आभार! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 30, 2015 at 7:29pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर , सादर धन्यवाद ! 

कृपया ध्यान दे...

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