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प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं.....

प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं.....

प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं
प्रेम धरा है प्रेम गगन है
प्रेम मिलन है प्रेम विरह है
श्वास श्वास का प्रेम बंधन है
प्रेम ईश है प्रेम है पूजा
स्मृति घाट का प्रेम मधुबन है
पावन गंगा सा प्रेम समेटे
लिप्त बूंदों में प्रेम नयन है
मौन अधरों में गुन गुन करता
प्रेम में डूबा प्रेम कम्पन है
आत्मसात का भाव समेटे
प्रेम हकीकत प्रेम स्वप्न है
प्रेम अलौकिक अपरिभाषित
हृदय नयन का प्रेम अंजन है
प्रेम तृप्ति है प्रेम प्यास है
मन के बन में प्रेम यौवन है
प्रेम आदि है प्रेम अंत है
इस सृष्टि का प्रेम सृजन है
प्रेम में डूबा हर कण कण है
प्रेम पुष्प है प्रेम चुभन है
प्रेम समर्पण का तपोवन है
प्रेम दीप है प्रेम है मन्दिर
प्रभु चरणों का प्रेम वन्दन है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by khursheed khairadi on February 25, 2015 at 10:12am

प्रेम अगन है प्रेम लगन हैं
प्रेम धरा है प्रेम गगन है 
प्रेम मिलन है प्रेम विरह है 
श्वास श्वास का प्रेम बंधन है 
प्रेम ईश है प्रेम है पूजा 
स्मृति घाट का प्रेम मधुबन है 

आदरणीय सुशील सरना साहब ,प्रेममय सुन्दर कविता है ,हर पंक्ति में प्रेम का नया रंग है |इस प्रेमासिक्त सुन्दर रचना हेतु आपको प्रेमपगी बधाई |सादर अभिनन्दन |

Comment by maharshi tripathi on February 24, 2015 at 11:16pm

पावन गंगा सा प्रेम समेटे 
लिप्त बूंदों में प्रेम नयन है........बहुत खूब आ.सुशिल जी |

Comment by Pari M Shlok on February 24, 2015 at 11:31am
वाह क्या खूब बखान किया है प्रेम का बधाई
हृदय होगा.. हिर्दय के स्थान पर शायद यदि मैं सही हूँ ?

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 24, 2015 at 10:31am

आदरणीय सुशील भाई , प्रेम बहुत सुन्दर परिभाषित हुआ है , लाजवाब ! हार्दिक बधाइयाँ । पंक्तियों मे मात्रा का संयोजन हो जाता तो पढ़्ने मे और भी आनंद आता ॥  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 24, 2015 at 12:54am

सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on February 24, 2015 at 12:45am

आदरणीय सुशील सरना सर ,प्रेम को परिभाषित करती इस सुन्दर रचना पर आपको हार्दिक बधाई ! सादर 

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