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ग़ज़ल - छग्गन तेरी फसलें....(मिथिलेश वामनकर)

22--22—22--22--22—2

 

दिल्ली से जो बासी रोटी आई है

अपने हिस्से में केवल चौथाई है

 

बातें क्या है, बातें बस चतुराई हैं

बातों में देखो कितनी गहराई है

 

मंहगाई की डायन कैसे भागेगी ?

तुमने भी तो चिल्लर से झड़वाई है

 

उम्मीदें क्या लोगों से करते, जिनके

आँखों में डर,  होठों पे तुरपाई है  

 

अफसर दौरे पे अक्सर कह जाते हैं

छग्गन तेरी खेती तो हरियाई है

 

अब के गाँवों में जाओ गर, तो देखो 

क्या रिश्तों में पहले-सी गरमाई है

 

आज सफलता के अंधे क्या समझेंगे

शुष्क नयन की ममता क्यूँ पथराई है

 

आईनों ने जब भी ठाना है अक्सर

दीवारों की हड्डी तक चटकाई है

 

झूठी है बाबुल के आँगन की मस्ती  

सहमी डोली, सहमी सी शहनाई है

 

अब तो काबिल कहलाता है, केवल वो

इज्जत जिसने दौलत से तुलवाई है

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by khursheed khairadi on March 3, 2015 at 9:43am

दिल्ली से जो बासी रोटी आई है

अपने हिस्से में केवल चौथाई है  वाह... आज की ग़ज़ल का मतला ..शानदार 

आदरणीय मिथिलेश जी ,लाज़वाब ग़ज़ल हुई है |सभी अशआर ज़दीद शायरी की बेमिसाल बानगी है | 

मंहगाई की डायन कैसे भागेगी ?

तुमने भी तो चिल्लर से झड़वाई है

 

उम्मीदें क्या लोगों से करते, जिनके

आँखों में डर,  होठों पे तुरपाई है  .....होठों पर तुरपाई ..अच्छा और अनोखा बिम्ब है |

 

अफसर दौरे पे अक्सर कह जाते है

छग्गन तेरी फसलें तो हरियाई है......................ग़ज़ल में व्यंग्य ऐसे कहा  जाता है...सुन्दर  

 

 

आज सफलता के अंधे क्या समझेंगे

घर में माँ की आँखें क्यूं पथराई है.........आज भावनाएं पथरा गई है ...भाई जी 

 

आईनों ने अक्सर जब भी ठाना है

आईनों ने दीवारें चटकाई है.......एक और अच्छा बिम्ब ...तयख्खुल ने काफ़ी मशक्कत की है ....बधाई 

 

झूठी है बाबुल के आँगन की मस्ती  

सहमी डोली, सहमी सी शहनाई है........कहारों के भेष में लुटेरे भी हैं 

 

अब तो केवल काबिल वो कहलाता है  

इज्जत जिसने दौलत से तुलवाई है.........ग़ज़ल का असली शेर जिसकी बोली लग सकती है ....भाई जी 

 आदरणीय मिथिलेश जी ..आज आदरणीय अदम साहब होते तो वाह..वाह  कह उठते |सादर अभिनन्दन |

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