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उमर तनहा गुजर जाये सहारा ढूढते जग में ,

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ - हजज मुसम्मन सालिम
चमन में फूल खिलते हैं खुशी का राज होता है |
ख़ुशी में झूमते  भौंरे  मजे  से  काज होता है |
खिले जब फूल डाली में नजारा ही बदल जाये ,
हजारों लोग  आते हैं  अनोखा  साज होता है |
उदासी का सबब होता उजाड़े जब चमन कोई  ,
विराने में कहाँ कोई खुशी का  काज  होता है |
मजा वैसा  नहीं आता  अकेले  राह चलने में ,
अगर  हो साथ में कोई मजे से काज होता है |
अगर कुछ  हो  परेशानी  बताते हैं अकेले  में ,
अगर साथी सफर में हो अलग ही नाज़ होता है|
उमर तनहा गुजर जाये   सहारा  ढूढते जग में ,
उजाड़ो ना चमन  वर्मा  जहाँ   बेताज  होता है |
श्याम नारायण वर्मा 
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 4:40pm
आदरणीय श्याम नरेन् वर्मा जी बह्र को खूबसूरती से निभाया है आपने। हार्दिक बधाई।
मिसरा-ए-उला और मिसरा-ए-सानी में कुछ अशआर मेंराराब्तानहीं लग रहा। हो सकता है मेरे समझने में चूक हो। काफ़िया की इतनी भी तंगी नहीं है कि बार बार एक ही प्रयोग किया जाए। सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 23, 2015 at 2:23pm

अ० वर्मा जी

सुन्दर गजल है . आपने' काज होता है' का दो बार प्रयोग किया इ ऐसा नहीं होना चाहिए . सादर .

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