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सुखदा सदा सरस्वती (वृत्यानुप्रास /छेकानुप्रास)

(यहाँ प्रति दोहे में वृत्यानुप्रास है किन्तु सम्पुर्ण रचना में छेकानुप्रास है  अंतर यह है की वृत्यानुप्रास में एक ही वर्ण की पुनरावृत्ति होती है जबकि छेका में अनेक वर्णों  की )

 

गा-गाकर गौरव गिरा गरिमामय गन्धर्व

गीर्वाण गुरु, गीतिमय , गान-ज्ञान गुण गर्व I

 भक्त भगवती भारती भूरि भावमय भव्य

भावशवलता, भ्रान्तिता भ्रमित भनिति भवितव्य I 

 

वीणापाणि वरानना  वरे विदुष विद्वान

वाणी-वाणी वत्सला  वर्ण-वर्ण वरदान I

 

शुभ्र शारदा शशिप्रभा  शोभित शुभ  शतपर्ण

शरद-शुक्ल शत शर्वरी शुचि शाश्वत शितिवर्ण I

 

स्वर साम्राज्ञी सर्वप्रिय  सतरंगी सब-साज

सुखदा सदा सरस्वती  सम्मुख सुकवि समाज I

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:47pm

प्रिय सोमेश

स्नेह और आशीश  .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:46pm

आ० मोहन सेठी  जी

आपका शुक्रिया . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:45pm

आ० विजय सर !

स्नेह और आशीष के लिए आभार . सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:44pm

आ० श्याम मठपाल जी

आपका अनुगृहीत हूँ . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:43pm

आ० गुमनाम जी

बहुत बहुत आभार .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:43pm

आ०  सौरभ जी

स्वयं पर लज्जित . जो चीज जानता था उसी पर चूक . फिलहाल सुधार किया है.  मार्ग निर्देश के लिये  शत -शत आभार .. सादर

Comment by vijay nikore on March 25, 2015 at 12:43pm

मनभावन वंदना। आनन्द आ गया।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:40pm

आ० अंजू मिश्र जी

बहुत आभार . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:39pm

प्रिय निर्मल नदीम

अत्यंत आभार . स्नेह .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 25, 2015 at 12:39pm

आ० कृष्णा मिश्र

बहुत बहुत धन्यवाद .स्नेह.

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