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आते-आते मैंने भी ललना से लगन लगाई है
थोड़ी कह लो देर भले,मैंने भी बीबी पायी है
आयी,मन की कोई भी कली नहीं मुरझाई है
लगता सब हरा-हरा,ख़ुशी चतुर्दिक छाई है।
हूरों की मशहूर कथाएँ होंगी,मुझे भला क्या,
मुझको तो अपनीवाली सबसे आगे भायी है
खाते ठोकर रह गये, कुछ भी तो मिला नहीं,
मुझको तो अपनीवाली मीठी-सी खटाई है।
बूँद-बूँद पानी को तरसा,चलती रहीं हवाएँ,
बेमौसम बरसात हुई,रूप की बदली छाई है।
फूल-फूल भटका हूँ ,काँटों की ताकीद रही,
मधु का अक्षय कोष ले मेरी'दुनिया'आयी है।

.
@मनन(मौलिक व अप्रकाशित)

 

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on April 12, 2015 at 9:12am

आदरणीय मिथिलेश जी, गोपालजी व गिरिराज भाई ! स्नेह-अर्पण तथा मार्गदर्शन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आप सभी को। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 6, 2015 at 12:01am

 आदरणीय मनन भाई , रचना के लिये बधाई ! पर-  गीतिका के विष्य मे आदरणीय गोपाल भाई जी से सहमत हूँ ।

Comment by Samar kabeer on April 5, 2015 at 11:02pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,आरम्भिका से लेकर अन्तिका तक सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 5, 2015 at 8:53pm

आ0  मनन जी

मानक के अनुसार यह न तो मात्रिक गीतिका छंद है और न वर्णिक . फिर  गीतिका का क्या आशय  है कही छोटा गीत तो आपका तात्पर्य  नहीं है . सादर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 5, 2015 at 5:59pm

आदरणीय मनन कुमार सिंह जी प्रस्तुति हेतु बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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