For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सरगम भरता, कल-कल करता, 

झर-झर  झरता  निर्झर  सस्वर I

तम को छलता, पग-पग चलता,

धक्-धक् जलता सूरज सत्वर  II

 

सन-सन बहता, गुम-सुम रहता, 

क्या-कुछ  कहता रह-रह मारुत  I

मह-मह उपवन, बह-बह कर मन,

यह क्या उलझन है रुत अजगुत II

 

छन-छन पायल, तन-मन घायल, 

मन्मथ  मायल  आतुर  बाले !

झन-झन  झनके, कंगन  खनके ,

बोले – ‘प्रिय  हैं  आने  वाले II’

 

थक-थक  नैना,  बुद-बुद  बैना, 

पचि-पचि  रैना,  अंसुवन काटी  I 

डिग-डिग संयम, धिग-धिग प्रियतम,

ढिग-ढिग  बंधन की  परिपाटी II

 

यदि  आ  जाते, रस  सरसाते,   

मधु  बरसाते,  मैं  मदमाती  I

मंदिर  मैय्या   पुहुप  दुनैय्या,   

लावा-लैय्या,  मैं  भर लाती II

(मौलिक व् अप्रकाशित )

Views: 984

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 17, 2015 at 12:03pm

अ० सौरभ जी

आपका शत शत आभार  i सचमुच दो चरणों में  तुकांतता  अपेक्षित थी  i  सस्वर भास्वर को भी ठीक करता हूँ .  बिन गुरु ज्ञान न होय सादर .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 16, 2015 at 8:46pm

जिन छन्दों का आपने नाम लिया है वे सोलह मात्रिक छन्द हैं. इनकी पूरी सुची यों है -

पद्धरि, अरिल्ल, डिल्ला, उपचित्रा, पज्झटिका, सिंह, विश्लोक, चित्रा, वनवासिका, मत्त समक, चित्रा, वानवासिका, चौपाई, शृंगार, पादाकुलक, पदपादाकुलक और चौपाई

सोलह मात्राओं के चरण होने के कारण ये सभी वस्तुतः चौपाई या पादकुलक की श्रेणी के छन्द माने जाते हैं लेकिन उनके विधान तनिक-तनिक भिन्न हैं. जैसे शृंगार और पद्धरि का अन्त गुरु-लघु से होता है अतः ये चौपाई के प्रारूप नहीं हैं. लेकिन अन्य का द्विकलों से ही पदान्त का विधान है. अतः ये सभी चौपाई के ही भिन्न प्रारूप हैं.

आगे तो आप भी जानते हैं आदरणीय कि चौपाई की एक अर्द्धाली दो चरणों की होती है और तुकान्तता में होती है. तो फिर सम चरणों की तुकान्तता का नियम कैसे मान्य हो सकता है, जैसा कि आपकी रचना में अपनाया गया है ? मेरा यही प्रश्न था. 

यदि मैं गलत हूँ तो यहाँ सुधार की पूरी गुंजाइश है. अन्यथा मेरे जाने नियम यही है जो मैं उद्धृत कर रहा हूँ. 

फिर,

सास्वर यदि टंकण त्रुटि है तो भास्वर से तुकान्तता अशुद्ध है. इसे भी देख लीजियेगा. 

सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:19pm

आ० सौरभ जी

जब आप रचना पर आते  है मुझे संतुष्टि मिलती है i आप कुछ न कुछ सिखा कर ही जाते हैं i

सास्वर  तो सस्वर होना चाहिए था पर टंकण त्रुटि हो गयी .

पादाकुलक  छंद  का शिल्प जहा से मैंने लिया है उसमे चार चौकल् की  ही बाध्यता बताई गयी है i अन्य छंद पादाकुलक  भेद है जैसे -पद्धरि , अरिल्ल, डिल्ला आदि i कृपया मुझे मार्ग दर्शन करें की चौकल के अतिरिक्त अन्य अपेक्षाएं क्या है ताकि आगे की रचनाये शुद्ध हो सकें . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:10pm

आ० श्यामनारायण वर्मा जी

सादर आभार .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:09pm

श्री सुनील  जी

आभार मित्र . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:09pm

आ० दीदी

आपके प्यार को नमस्कार .  सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:08pm

आ० हरी प्रकाश दुबे जी

शुक्रिया भाई जी .  सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:07pm

प्रिय कृष्णा

बहुत  बहुत आभार . स्नेह .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:07pm

आ० सरना जी

अनुगृहीत हुआ . सादर .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 16, 2015 at 8:05pm

आ० विजय सर !

हार्दिक आभार  i

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"जय हो "
12 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 175 in the group चित्र से काव्य तक
"सरसी छंद +++++++++ उषा काल आरम्भ हुआ तब, अर्ध्य दिये नर नार। दूर हुआ अँधियारा रवि का, फैले तेज…"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आ. भाई सुशील जी , सादर अभिवादन। प्रदत्त विषय पर सुंदर दोहा मुक्तक रचित हुए हैं। हार्दिक बधाई। "
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय अजय गुप्ताअजेय जी, रूपमाला छंद में निबद्ध आपकी रचना का स्वागत है। आपने आम पाठक के लिए विधान…"
Jan 18
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सृजन समृद्ध हुआ…"
Jan 18
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"आदरणीय सौरभ जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । आपका संशय और सुझाव उत्तम है । इसके लिए…"
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आयोजन में आपकी दूसरी प्रस्तुति का स्वागत है। हर दोहा आरंभ-अंत की…"
Jan 18

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"  आदरणीय सुशील सरना जी, आपने दोहा मुक्तक के माध्यम से शीर्षक को क्या ही खूब निभाया है ! एक-एक…"
Jan 18
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२ **** तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१। * देवता…See More
Jan 18
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"अंत या आरंभ  --------------- ऋषि-मुनि, दरवेश ज्ञानी, कह गए सब संतहो गया आरंभ जिसका, है अटल…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा पंचक  . . . आरम्भ/अंत अंत सदा  आरम्भ का, देता कष्ट  अनेक ।हरती यही विडम्बना ,…"
Jan 17
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-182
"दोहा मुक्तक. . . . . आदि-अन्त के मध्य में, चलती जीवन रेख ।साँसों के अभिलेख को, देख सके तो देख…"
Jan 17

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service