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“ बेटा!! आ गया तू.. कहाँ-कहाँ हो आया भारत भ्रमण में..?

“ माँ!! चारो दिशाओं में गया था. देखो! गंगाजी का जल भी लाया हूँ.  आप कहो तो, पिताजी लाये थे वो कलश आधा खाली है उसमे ही डाल दूँ..”

“ नहीं!!  बेटा.. रोज समाचारों में सुनती हूँ कि गंगा में स्वच्छता अभियान चल रहा है, वर्षों पहले तेरे पिता जो लाये वो तू बचा के रखना. कम से कम आगे आने वाली पीढ़ी,  पवित्र गंगाजल तो देख लेगी..”

  

    जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 22, 2015 at 10:30am

आपकी बधाई सिर आँखों पर ,आदरणीय डा.विजय जी. सराहना हेतु आपका आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 22, 2015 at 10:29am

आपके स्नेह हेतु आपका आभारी हूँ आदरणीय कृष्णा भाई  जी. लघुकथा पर आपके सुझाव सिर आँखों पर.//गंगा में स्वच्छता अभियान चल रहा है,// इस पंक्ति से जहाँ आपको विरोधाभास सा लग रहा है, किन्तु मैं यह कहना चाहूँगा कि यह पंक्ति लघुकथा में मारक भी है प्रदूषित तो हर छोटी-बड़ी नदी है जहाँ सिर्फ मिडिया या अखवारों की सुर्खी बने स्वच्छता अभियान से उन्हें सिर्फ कागजों में प्रदुषण रहित बनाया जा रहा है. 

सादर!

Comment by Tanuja Upreti on April 22, 2015 at 7:57am
गागर में सागर भरती लघु कथा बहुत अच्छे जितेन्द्र जी
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 22, 2015 at 6:44am

सच है ....स्वच्छ गंगाजल अब एक सपना ही है ....और अभियान काग़ज पर ही चलेगा ...सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 22, 2015 at 6:09am
बहुत सटीक वार है , हम विचार सहेजते हैं , धरोहर नहीं , बहुत बहुत बधाई , प्रिय जीतेन्द्र जी , सादर।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 22, 2015 at 12:11am

क्या बात है!आ० जितेन्द्र सरजी!एक और सुन्दर लघुकथा पर हार्दिक बधाई!!
>>गंगा में स्वच्छता अभियान चल रहा है यह थोडा विरोधाभास पैदा कर रहा है,गंगा में प्रदूषण की खबर ऱोज पढ़ती हूँ..या ऐसा कुछ मेरे ख्याल से बेहतर रहता!

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