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उस घर के आँगन में लोगों का जमावड़ा लगा हुआ और माहौल एकदम शांत था. अचानक जैसे ही तिरंगे में लिपटे हुए शव को सेना के वाहन से लाया गया तो सबसे पहले अपना होश खोकर वो घर के अन्दर से पागलों की तरह चीख मारती हुयी अपने दस वर्षीय बेटे के साथ,  बाहर आकर सीमा पर शहीद हुए अपने पति के शव से लिपट-लिपट कर रोने लगी. शहीद सीमा सुरक्षा बल का जवान था. उसने दुश्मनों की सीमा में घुसकर उनके दल-बल को तहस-नहस कर डाला. बाद में दुश्मनों ने धोखे से उसे बंदी बनाकर रखा, फिर  उसकी आँखें फोड़ दी गईं और शरीर को गोलियों से छलनी कर फेंक दिया. बुरी तरह क्षत-विक्षत चेहरे को देख, थोड़ी देर में  ही रोते-रोते उसके  मुंह से आवाज निकलना बंद हो गया.. और  पास ही बैठा उसका लाल, उसकी ठोड़ी को अपने नन्हे हाथों से पकड़कर बोला...

“ माँ!! मैं भी बड़ा होकर, पापा की तरह दुश्मनों को मार गिराऊंगा...”

उस विधवा ने अपने हाथ को अपने बेटे के सिर पर फेरते हुए एक माँ के फर्ज अदा करने की ठान ली थी...

                                                 

 

  जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)     

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 3, 2015 at 7:33pm
आदरणीय जितेंद्र पस्टारिया जी आपका बहुत बहुत आभार
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2015 at 12:42am

आदरणीय विजय निकोर जी, आदरणीय जवाहर जी, आदरणीय श्याम नारायण जी, आदरणीय अखिलेश जी, आदरणीय नवीन जी. आप सभी की उपस्थिति व् प्रोत्साहित करती सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह यूहीं बनाये रखियेगा

 सादर!.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2015 at 12:27am

आदरणीय बागी जी. आपकी बहुमूल्य उपस्थिति, लघुकथा पर तमगा है, आपका ह्रदय से आभारी हूँ

सादर!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 30, 2015 at 12:17pm

बहुत ही सुन्दर कहने का अंदाज बिलकुल अलग!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 29, 2015 at 1:37pm

आदरणीय सौरभ जी. आपकी बधाई व् शुभकामनायें सिर आँखों पर. यह क्षण आपके आशीर्वाद व् मार्गदर्शन का नतीजा है. आपके स्नेह का हृदयतल से आभारी हूँ

सादर!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 28, 2015 at 11:03pm

वाह भाई जितेद्र जी, आप इस लघुकथा को सीमा से खींच लाए , अच्छी और प्रेरक कथा पर बधाई.

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 28, 2015 at 10:06pm
मित्र प्रेरणादायक कहानी है
आम तौर पर जब पति और बाप की लाश आती है तो शब्द मौन हो जाते हैं सिर्फ आँसू ही दीखते हैं ।
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 28, 2015 at 5:34pm

आ. जीतू भाई 

मार्मिक जरूर है पर सच पूछो तो यह साहसी माँ और बेटे  की कथा है। हार्दिक बधाई 

Comment by vijay nikore on April 28, 2015 at 4:26pm

 अति मार्मिक लघु कथा अच्छी लगी। बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 28, 2015 at 1:16pm

आपके कहने के ढंग में स्थायित्व आता जारहा है, जितेन्द्र भाई .. मेरे लिए ये आश्वस्त करते क्षण हैं.

हृदय से बधाई एवं शुभकामनाएँ.

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