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“ बेटा!! आ गया तू.. कहाँ-कहाँ हो आया भारत भ्रमण में..?

“ माँ!! चारो दिशाओं में गया था. देखो! गंगाजी का जल भी लाया हूँ.  आप कहो तो, पिताजी लाये थे वो कलश आधा खाली है उसमे ही डाल दूँ..”

“ नहीं!!  बेटा.. रोज समाचारों में सुनती हूँ कि गंगा में स्वच्छता अभियान चल रहा है, वर्षों पहले तेरे पिता जो लाये वो तू बचा के रखना. कम से कम आगे आने वाली पीढ़ी,  पवित्र गंगाजल तो देख लेगी..”

  

    जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 26, 2015 at 8:40pm

आपकी प्रोसाहित करती सराहना हेतु आपका आत्मीय आभार,आदरणीय शिज्जू जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 26, 2015 at 8:39pm

आपका बहुत-बहुत आभार,आदरणीय अमन जी

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 11:58am

सामयिक विषय पर अच्छी लघुकथा प्रस्तुत की है आपने आदरणीय जितेन्द्र भाई बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by aman kumar on April 25, 2015 at 1:31pm

गंगा में स्वच्छता अभियान चल रहा है, के बाद पुराना जल अधिक शुद्ध क्यू माना माता जी ने ......?संसमयिक मुद्धों पीआर लिखना सदेव अच्छा होता है !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 25, 2015 at 9:53am

लघुकथा पर आपकी उपस्थिति व् सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ, आदरणीय केवल जी.

सादर!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 24, 2015 at 6:45pm

आ0 जितेंद्र भाईजी,  आत्मा को छू लेने मे रचना सफल हुई है.  हार्दिक बधाई. सादर,

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 24, 2015 at 9:53am

आदरणीय निलेश जी, आपका ह्रदय से आभार

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 24, 2015 at 9:52am

आदरणीया राजेश दीदी. लघुकथा पर आपकी  प्रोत्साहित करती सराहना सदा संबल प्रदान करती है, आपका आत्मीय आभारी हूँ

सादर!

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 23, 2015 at 10:49pm

निशब्द हूँ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 23, 2015 at 10:44pm

वाह वाह  फिर से एक बेहतरीन लघु कथा जिसमे एक जागृत करता सन्देश छुपा है ...बहुत बहुत बधाई जितेन्द्र भैया इस शानदार लघु कथा पर |

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