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ग़ज़ल : बीज मुहब्बत के गर हम तुम बो जाएँगे

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२

 

जीवन से लड़कर लौटेंगे सो जाएँगे

लपटों की नाज़ुक बाँहों में खो जाएँगे

 

बिना बुलाए द्वार किसी के क्यूँ जाएँ हम

ईश्वर का न्योता आएगा तो जाएँगे

 

कई पीढ़ियाँ इसके मीठे फल खाएँगी

बीज मुहब्बत के गर हम तुम बो जाएँगे

 

चमक दिखाने की ज़ल्दी है अंगारों को

अब ये तेज़ी से जलकर गुम हो जाएँगे

 

काम हमारा है गति के ख़तरे बतलाना

जिनको जल्दी जाना ही है, वो जाएँगे

----------

(मौलिक एवं अप्राकाशित)

Views: 682

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 11, 2015 at 6:43pm

शुक्रिया  Madan Mohan saxena जी

Comment by Madan Mohan saxena on May 20, 2015 at 2:54pm

बधाई हो

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 13, 2015 at 10:22pm

शुक्रिया आ.  Ram Ashery जी

Comment by Ram Ashery on May 10, 2015 at 12:58pm

अति सुंदर भावाभिव्यक्ति के लिए आपको बधाई हो 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:11pm

शुक्रिया आ. भुवन निस्तेज जी

Comment by भुवन निस्तेज on May 5, 2015 at 10:33am

चमक दिखाने की ज़ल्दी है अंगारों को

अब ये तेज़ी से जलकर गुम हो जाएँगे

vah vah vah....

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 2, 2015 at 3:44pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. शिज्जू जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 11:54am

बहुत खूबसूरत रचना हुई है आदरणीय धर्मेंद्र जी बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 23, 2015 at 5:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. गोपाल नारायन जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 23, 2015 at 5:20pm

शुक्रिया आ. नीलेश जी

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