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ग़ज़ल : अमीरी बेवफ़ा मौका मिले तो छोड़ जाती है

बह्र : १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

अमीरी बेवफ़ा मौका मिले तो छोड़ जाती है

गरीबी ही सदा हमको कलेजे से लगाती है

 

भरा हो पेट जिसका ठूँस कर उसको खिलाती पर

जो भूखा हो अमीरी भी उसे भूखा सुलाती है

 

अमीरी का दिवाला भर निकलता है सदा लेकिन

गरीबी कर्ज़ से लड़ने में जान अपनी गँवाती है

 

अमीरी छू के इंसाँ को बना देती है पत्थर सा

गरीबी पत्थरों को गढ़ उन्हें रब सा बनाती है

 

ये दोनों एक माँ की बेटियाँ हैं इसलिए ‘सज्जन’

गरीबी ख़ून देकर भी अमीरी को बचाती है

----

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 743

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. विजय निकोर जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. जितेन्द्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:14pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. मनोज साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:14pm

बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:14pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. सीमा जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:13pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ.  Vijai Shanker  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2015 at 7:12pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ. महिमा जी

Comment by vijay nikore on May 4, 2015 at 3:11pm

 अच्छी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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