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उस घर के आँगन में लोगों का जमावड़ा लगा हुआ और माहौल एकदम शांत था. अचानक जैसे ही तिरंगे में लिपटे हुए शव को सेना के वाहन से लाया गया तो सबसे पहले अपना होश खोकर वो घर के अन्दर से पागलों की तरह चीख मारती हुयी अपने दस वर्षीय बेटे के साथ,  बाहर आकर सीमा पर शहीद हुए अपने पति के शव से लिपट-लिपट कर रोने लगी. शहीद सीमा सुरक्षा बल का जवान था. उसने दुश्मनों की सीमा में घुसकर उनके दल-बल को तहस-नहस कर डाला. बाद में दुश्मनों ने धोखे से उसे बंदी बनाकर रखा, फिर  उसकी आँखें फोड़ दी गईं और शरीर को गोलियों से छलनी कर फेंक दिया. बुरी तरह क्षत-विक्षत चेहरे को देख, थोड़ी देर में  ही रोते-रोते उसके  मुंह से आवाज निकलना बंद हो गया.. और  पास ही बैठा उसका लाल, उसकी ठोड़ी को अपने नन्हे हाथों से पकड़कर बोला...

“ माँ!! मैं भी बड़ा होकर, पापा की तरह दुश्मनों को मार गिराऊंगा...”

उस विधवा ने अपने हाथ को अपने बेटे के सिर पर फेरते हुए एक माँ के फर्ज अदा करने की ठान ली थी...

                                                 

 

  जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)     

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Comment by Shyam Narain Verma on April 28, 2015 at 10:50am
बहुत उम्दा , बधाई इस लघुकथा के लिए ..
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:45am

रचना पर आपकी सराहना व् मार्गदर्शन हेतु आपका बहुत-बहुत आभार, आदरणीय अमन जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:44am

लघुकथा की प्रोत्साहित करती सराहना हेतु आपका आभारी हूँ, आदरणीय मोहन जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:43am

लघुकथा के मर्म को आपने छुआ, आपका ह्रदय से आभार, आदरणीय डा.गोपाल जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:42am

रचना पर आपके आशीर्वाद हेतु आपका आभारी हूँ,आदरणीय डा.विजय जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:41am

लघुकथा की सराहना हेतु आपका आभारी हूँ, आदरणीय मिथिलेश जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 28, 2015 at 9:40am

आदरणीय पंकज जी, आपका बहुत-बहुत आभार

सादर!

Comment by aman kumar on April 28, 2015 at 8:50am

लघु कथा मे रेपोर्टिंग के गुण आ रहे है ! 

विसय वस्तु अच्छी है !

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 28, 2015 at 7:19am

युद्ध से आज तक कुछ हल नहीं हुआ मगर कमज़ोर भी नहीं पड़ सकते .......सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 27, 2015 at 8:19pm

जीतू भैय्या

आपकी प्रस्तुति मार्मिक है  . सादर .

कृपया ध्यान दे...

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