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समय कितना बदल गया है. वो दिन थे जब शरीर तोड़कर उतना ही पैदा कर पाता था, कि साल भर अपने परिवार का पेट भर सके.. अगर चार दिन को कोई मेहमान आ जाए तो आस-पड़ोस से उधार मांग लाता. और खूब से खूब इस बार के कर्ज के गड्डे को भर, फिर खुदाई शुरू कर देता..

आज भरपूर बिजली, पानी और कम ब्याज पर सरकारी ऋण से पैदावार बहुत बड़ गई है, अश्विन और बैशाख के माह में हर तरफ अनाज ही अनाज. खुशियों के सपने संजोये,  बैलगाड़ी की जगह ट्रकों से अनाज लेकर उपार्जन केंद्र पर खड़ा है..

“ बाबूजी!! यह रहा मेरा पंजीयन. जल्दी से  मेरा अनाज तुलवा दीजिये..”

“ सुनो! भाई.. यहाँ बहुत दिक्कते है, बहुत सारी अव्यवस्थायें है. आपको कुछ दिन रुकना पड़ेगा..”

“ लेकिन बाबूजी, कई दिनों से इन्तजार कर रहें है. कब तक खाली हाथ लौटें..”

“ तो मैं क्या करूँ..भैया ? क्यों इतना पैदा कर रहे हो कि पूरा तंत्र ही परेशान हो गया..”  

एक शासकीय मुलाजिम की यह बात सुन, उसे अपनी संतुष्टि भरी अवनति याद आ गई...

 

 

   जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 7, 2015 at 1:35pm

आदरणीय जीतेन्द्र जी इस शानदार लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by Ravi Prabhakar on May 7, 2015 at 11:32am

/तो मैं क्या करूँ..भैया ? क्यों इतना पैदा कर रहे हो कि पूरा तंत्र ही परेशान हो गया../ जोरदार व झन्‍नाटेदार । बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:52pm

आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है आदरणीय डा.विजय जी. आपकी उपस्थिति हेतु आपका आभारी हूँ

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:51pm

आपका बहुत-बहुत आभार, आदरणीया ज्योत्स्ना जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:50pm

 आपकी संतोषजनक प्रतिक्रिया लघुकथा को सार्थकता प्रदान करती है ,आदरणीय मिथिलेश जी. आपका हार्दिक आभार

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:48pm

प्रोत्साहन व् सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ, आदरणीय वीर मेहता जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:47pm

आपका बहुत-बहुत आभार, आदरणीय मनोज जी

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 6, 2015 at 11:46pm

आपकी उत्साहवर्धक सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय मोहिन्दर जी

सादर!

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 6, 2015 at 5:55pm
वाह! बहुत ही सटीक, यथार्थ, " इतना क्यों पैदा करते हो कि ……… , काम हमारा बढ़ाते हो " . इस कार्य-शैली ने भी बहुत नुक्सान किया है देश का।
बहुत बहुत बधाई, प्रिय जीतेन्द्र जी, सादर।
Comment by jyotsna Kapil on May 6, 2015 at 5:54pm
सरकारी तंत्र पर एक सटीक कटाक्ष करती हुई कथा।

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