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मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये
कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये

खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  
फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये

ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’
उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी चाहिये !

हो सके तो बन्द सारी खिड़कियाँ हम खोल दें
अब शहर में ज़िन्दग़ी की साँस चलनी चाहिये

देश के उत्थान की चिंता करे सरकार ही ?
राष्ट्र-हित की आग तो हर दिल में’ जलनी चाहिये    

भेद मत्सर औ’ घृणा के रोक ले अवशिष्ट जो-
हाथ में हर नागरिक के एक छलनी चाहिये
************
-सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Shyam Narain Verma on May 7, 2015 at 3:56pm

वाह ! बहुत खूब | सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 7, 2015 at 3:09pm

आदरणीय सौरभ सर ..आज बहुत दिनों बाद आपके ग़ज़ल पढने को मिली ....कहीं मशविरा ..कहीं खुशहाली की कामना करती ....कहीं आध्यत्मिक बोध कराती ....कहीं हिदायत देती ..कहीं देश के सर्वोपरी  हितों की बात करती ..कहीं देश में अमन चैन खुशहाली के लिए नागरिकों को उनका कर्तव्य बोध कराती शसक्त शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 7, 2015 at 2:06pm

बेहतरीन तहरी गज़ल हुयी है आ० सौरभ सर!हरेक शेर अपने आप में गहन अर्थ लिए हुए!अभिनन्दन!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on May 7, 2015 at 1:21pm
//देश के उत्थान की चिंता करे सरकार ही ?
राष्ट्र-हित की आग तो हर दिल में’ जलनी चाहिये

भेद मत्सर औ’ घृणा के रोक ले अवशिष्ट जो-
हाथ में हर नागरिक के एक छलनी चाहिये//

आदरणीय सौरभ जी, मैं कोई विशेषज्ञ नहीं....और वह भी ग़ज़ल के मामले में तो कदापि नहीं. लेकिन कुछ पंक्तियाँ पढ़ने से अंदर का इंसान कुलबुला उठता है....ऐसी ही पंक्तियाँ किसी रचना की सार्थकता को प्रतिबिम्बित करती हैं. बहुत अच्छी लगी आपकी रचना....विशेष रूप से उपरोक्त चार पंक्तियाँ. सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:33pm

आदरणीय मोहन सेठी जी, आपका हार्दिक स्वागत है. प्रस्तुति को अनुमोदित करने के लिए धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:33pm

वीनस भाई, आपकी उपस्थिति निस्संदेह भली लगी. कहा आपने कुछ नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसी भावभूमि की ग़ज़लों को आप किस तरह से लेते हैं.

विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान में आयोजित ग़ज़ल गोष्ठी ’हिन्दी ग़ज़ल की नयी पीढ़ी’ में अपनी ग़ज़ल कहने के पूर्व जो कुछ मैंने कहा था, वैसी ही सोच ग़ज़ल के इस प्रारूप को सदिश बना सकती है. सोच और विचार ही नहीं इंगितों और बिम्बों से भी भाव इसी भूमि के हों.
इस संदर्भ में अयोध्या प्रसाद गोयलीय की शेर-ओ-सुख़न के प्रथम भाग के प्रारम्भिक चैप्टरों के कथ्य अनुमन्य व स्वीकार्य होने चाहिये.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:33pm

आदरणीय मिथिलेश भाई, हिन्दी ग़ज़ल की भावभूमि को यदि उर्वर करना है तो प्रयास ही नहीं वैचारिकता को भी तदनुरूप रखना होगा. ’बाग़’ को मात्र ’उपवन’ या ’ज़रूरत’ को ’आवश्यकता’ कर देने से कोई ग़ज़ल हिन्दी भावभूमि की रचना नहीं हो जाती. इस संदर्भ में आदरणीय ख़ुर्शीद ख़ैराडी या आदरणीय नीलेशजी की ग़ज़लों को मैं सार्थक प्रायस के रूप में देखता हूँ. जबकि आदरणीय नीलेशजी की ग़ज़लों में अमूमन उर्दू के शब्द हुआ करते हैं. हो सकता है वे आगे अपनी दिशा तनिक बदल लें.
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:32pm

भाई जितेन्द्रजी, आपकी अनुशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:32pm

आदरणीय विजय शंकरजी, आपकी प्रशंसा मेरे लिए गहन अर्थ रखती है. आपने जिस शेर को उद्धृत किया है वह तनिक अलग भावदशा को इंगित करता है.
अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय.

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 7, 2015 at 8:26am

वाह जनाब वाह ...बहुत खूब शेर हैं ....सादर 

खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  
फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये

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