For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

मध्य अपने जम गयी क्यों बर्फ़.. गलनी चाहिये
कुछ सुनूँ मैं, कुछ सुनो तुम, बात चलनी चाहिये

खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  
फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये

ध्यान की अवधारणा है, ’वृत्तियों में संतुलन’
उस प्रखरतम मौन पल की सोच फलनी चाहिये !

हो सके तो बन्द सारी खिड़कियाँ हम खोल दें
अब शहर में ज़िन्दग़ी की साँस चलनी चाहिये

देश के उत्थान की चिंता करे सरकार ही ?
राष्ट्र-हित की आग तो हर दिल में’ जलनी चाहिये    

भेद मत्सर औ’ घृणा के रोक ले अवशिष्ट जो-
हाथ में हर नागरिक के एक छलनी चाहिये
************
-सौरभ
(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 1327

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Shyam Narain Verma on May 7, 2015 at 3:56pm

वाह ! बहुत खूब | सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 7, 2015 at 3:09pm

आदरणीय सौरभ सर ..आज बहुत दिनों बाद आपके ग़ज़ल पढने को मिली ....कहीं मशविरा ..कहीं खुशहाली की कामना करती ....कहीं आध्यत्मिक बोध कराती ....कहीं हिदायत देती ..कहीं देश के सर्वोपरी  हितों की बात करती ..कहीं देश में अमन चैन खुशहाली के लिए नागरिकों को उनका कर्तव्य बोध कराती शसक्त शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 7, 2015 at 2:06pm

बेहतरीन तहरी गज़ल हुयी है आ० सौरभ सर!हरेक शेर अपने आप में गहन अर्थ लिए हुए!अभिनन्दन!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on May 7, 2015 at 1:21pm
//देश के उत्थान की चिंता करे सरकार ही ?
राष्ट्र-हित की आग तो हर दिल में’ जलनी चाहिये

भेद मत्सर औ’ घृणा के रोक ले अवशिष्ट जो-
हाथ में हर नागरिक के एक छलनी चाहिये//

आदरणीय सौरभ जी, मैं कोई विशेषज्ञ नहीं....और वह भी ग़ज़ल के मामले में तो कदापि नहीं. लेकिन कुछ पंक्तियाँ पढ़ने से अंदर का इंसान कुलबुला उठता है....ऐसी ही पंक्तियाँ किसी रचना की सार्थकता को प्रतिबिम्बित करती हैं. बहुत अच्छी लगी आपकी रचना....विशेष रूप से उपरोक्त चार पंक्तियाँ. सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:33pm

आदरणीय मोहन सेठी जी, आपका हार्दिक स्वागत है. प्रस्तुति को अनुमोदित करने के लिए धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:33pm

वीनस भाई, आपकी उपस्थिति निस्संदेह भली लगी. कहा आपने कुछ नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ कि ऐसी भावभूमि की ग़ज़लों को आप किस तरह से लेते हैं.

विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान में आयोजित ग़ज़ल गोष्ठी ’हिन्दी ग़ज़ल की नयी पीढ़ी’ में अपनी ग़ज़ल कहने के पूर्व जो कुछ मैंने कहा था, वैसी ही सोच ग़ज़ल के इस प्रारूप को सदिश बना सकती है. सोच और विचार ही नहीं इंगितों और बिम्बों से भी भाव इसी भूमि के हों.
इस संदर्भ में अयोध्या प्रसाद गोयलीय की शेर-ओ-सुख़न के प्रथम भाग के प्रारम्भिक चैप्टरों के कथ्य अनुमन्य व स्वीकार्य होने चाहिये.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:33pm

आदरणीय मिथिलेश भाई, हिन्दी ग़ज़ल की भावभूमि को यदि उर्वर करना है तो प्रयास ही नहीं वैचारिकता को भी तदनुरूप रखना होगा. ’बाग़’ को मात्र ’उपवन’ या ’ज़रूरत’ को ’आवश्यकता’ कर देने से कोई ग़ज़ल हिन्दी भावभूमि की रचना नहीं हो जाती. इस संदर्भ में आदरणीय ख़ुर्शीद ख़ैराडी या आदरणीय नीलेशजी की ग़ज़लों को मैं सार्थक प्रायस के रूप में देखता हूँ. जबकि आदरणीय नीलेशजी की ग़ज़लों में अमूमन उर्दू के शब्द हुआ करते हैं. हो सकता है वे आगे अपनी दिशा तनिक बदल लें.
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:32pm

भाई जितेन्द्रजी, आपकी अनुशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2015 at 12:32pm

आदरणीय विजय शंकरजी, आपकी प्रशंसा मेरे लिए गहन अर्थ रखती है. आपने जिस शेर को उद्धृत किया है वह तनिक अलग भावदशा को इंगित करता है.
अनुमोदन के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय.

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 7, 2015 at 8:26am

वाह जनाब वाह ...बहुत खूब शेर हैं ....सादर 

खींचता है ये ज़माना यदि लकीरें हर तरफ  
फूल वाली क्यारियों में वो बदलनी चाहिये

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Tuesday
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service