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गज़ल - बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है ( गिरिराज भंडारी )

1212   1122   1212   22  /112

चली गई मेरी मंज़िल कहीं पे चल के क्या

या रह गया मैं कहीं और ही बहल के क्या

 

वहाँ पे गाँव था मेरा जहाँ दुकानें हैं  

किसी से पूछता हूँ , देख लूँ टहल के क्या

 

असर बनावटी टिकता कहाँ था देरी तक

वही पलों में तुम्हें रख दिया बदल के क्या

 

हरेक हाथ में पत्थर छुपा हुआ देखा

ये गाँव फिर से रहेगा कभी दहल के क्या

 

मेरा ये घर सही मिट्टी, मगर ये मेरा है

मुझे न पूछ थे अरमाँ कभी महल के क्या

 

मुझे लगा कि अब , सूरज उदास रहता है

चलो तो पूछें, वो रोता रहा था ढल के क्या

 

बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है

ये लम्हें आखिरी हैं अब करूँ सँभल के क्या

 

परों का साथ नहीं है जिसे उड़ानों में

तुम्हीं कहो वो करे फर्श पे उछल के क्या 

************************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित 

 

Views: 1086

Comment

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Comment by umesh katara on May 7, 2015 at 9:56pm

वाहहहह वाहहहह क्या बात है सर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 8:59pm

आदरणीय केवल भाई , आपकी सराहना ने गज़ल का मान बढ़ा दिया , आपका बहुत आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 8:58pm

आदरणीय सुशील सरना भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 8:57pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , गज़ल पर आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया के लिये दिली शुक्रिया , कुछ शे र आपको पसंद आये तो  संतोष हुआ । जिन अशआर का आपने जिक्र किया है , मै उनमें सुधार करने का प्रयस करूँ गा । अगर कोई सलाह सूझे तो ज़रूर साझा कीजियेगा । आपका पुनः आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 8:52pm

आदरणीय श्याम भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 7, 2015 at 8:52pm

आदरणीय कृष्णा भाई , गज़ल की सराहना और उत्साह्वर्धन के लिये आपका दिली शुक्रिया ॥

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 7, 2015 at 8:03pm

आ0 भंडारी भाई जी,  सुंदर गज़ल के लिये दाद कुबूल करे.  सादर

Comment by Sushil Sarna on May 7, 2015 at 7:57pm

बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है
ये लम्हें आखिरी हैं अब करूँ सँभल के क्या
वाह आदरणीय गिरिराज भंडारी जी वाह बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है … हार्दिक मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 7, 2015 at 4:58pm

आदरणीय गिरिराज सर बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं-

 

चली गई मेरी मंज़िल कहीं पे चल के क्या

या रह गया मैं कहीं और ही बहल के क्या................ वाह बेहतरीन मतला 

 

वहाँ पे गाँव था मेरा जहाँ दुकानें हैं  

किसी से पूछता हूँ , देख लूँ टहल के क्या.............. वाह वाह 

 

असर बनावटी टिकता कहाँ था देरी(?) तक

वही पलों में तुम्हें रख दिया बदल के क्या........... शेर खुल नहीं रहा है सर.

 

हरेक हाथ में पत्थर छुपा हुआ देखा

ये गाँव फिर से रहेगा कभी दहल के क्या............फिर से और कभी का एक साथ प्रयोग ?

 

मेरा ये घर सही मिट्टी, मगर ये मेरा है

मुझे न पूछ थे अरमाँ कभी महल के क्या..............मिसरा-ए-उला के स्पष्ट कथन के बाद सानी में पूछ के प्रयोग पर सशंकित हूँ सर.

 

मुझे लगा कि अब , सूरज उदास रहता है

चलो तो पूछें, वो रोता रहा था ढल के क्या.................. वाह

 

बहक ही जाने दो मुझको, कि अब बचा क्या है

ये लम्हें आखिरी हैं अब करूँ सँभल के क्या.......... बेहतरीन शेर

 

परों का साथ नहीं है जिसे उड़ानों में

तुम्हीं कहो वो करे फर्श पे उछल के क्या ........ उम्दा

 

सादर

 

Comment by Shyam Narain Verma on May 7, 2015 at 3:25pm
लाजवाब रचना है बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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