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ग़ज़ल ; यकायक चराग़ों को क्या हो गया है

122 122 122 122

यकायक चराग़ों को क्या हो गया है
बुझे थे, जले फिर, ये किसकी दुआ है.

चलो और दिन तो है बाकी, रूकें क्यों
शजर पे अभी नूर देखो झुका है.

इसी आरज़ू में कटी ज़िन्दगी ये
पता तो चले क्या हमारा हुआ है.

अभी छू नहीं सर्द हांथों से ऐ शब
अभी तो मुझे उसने मन से छुअा है.

मुहब्बत किसे रास आई है इसमें
अमीरी, ग़रीबी, ज़माना, जुआ है.

- श्री सुनील

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by shree suneel on May 14, 2015 at 1:01pm
सराहना के लिए धन्यवाद आदरणीय निलेश जी.
आपने सही ध्यान दिलाया आदरणीय. दरअस्ल, मैंने 'उआ' हीं काफिया लिया था. पोस्ट करने से पहले एक तब्दीली कर दी जिससे ये दोष आ गया.
दूसरे शे'र में 'शजर पे अभी नूर देखो झुका है.' की जगह पहले मैने लिखा था ' शजर पे अभी शोख सी हीं शुआ है'. इसमें लफ्ज 'शुआ' पे संदेह था क्योंकि ये 'शुआअ' होता है.तो क्या 'शुआअ' को 'शुआ' भी लिख सकते हैं जैसे 'सहीअ' को 'सही'. यदि नहीं तो मतला फिर बदलना हीं होगा. कृपया मार्गदर्शन करें.
Comment by shree suneel on May 14, 2015 at 12:24pm
शुक्रिया.. शुक्रिया आदरणीय विजय शंकर सर.
Comment by Nirmal Nadeem on May 14, 2015 at 11:46am
बहुत खूब भाई। नीलेश सर की बात पे ज़रूर ध्यान दें।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 14, 2015 at 11:43am

बहुत अच्छे ..बधाई आपको .
मतले में हुआ और दुआ लेने से काफ़िया उआ लेने की बाध्यता हो जाएगी.
मतले में तबदीली कर लें तो बाक़ी सब ठीक हो जाएगा
सादर  

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 14, 2015 at 10:57am
चराग़ों को ये क्या यकायक हुआ है
बुझे थे, जले फिर, किसी की दुआ है.
बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आदरणीय श्री सुनील जी, बधाई, सादर।

कृपया ध्यान दे...

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