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रामलीला... /श्री सुनील

शहर की चहारदीवारी से कान लगाओ तो
शहर के हालात का पता चलता है.

अपहरण के बाद अपह्रीत की गिड़गिड़ाहट...
बलात्कारी की ख़ामोशी
और नारी की दीर्घ चीख.

ख़ून के छींटे बेचता अख़बार वाला.

पेट्रोल और डीजल अब कारक नहीं प्रदूषण के
उसकी जगह ले चुकी बारूद की गंध- फांद चुकी शहर की चहारदीवारी.

रेंगने की आवाज़ पे मैं चौंका -
वह सुकून था-दीवारों में सुराख ढूँढता हुआ.

चहारदीवारी से चिपके कान की नसें क्या तनीं,
दीवार पे चढ़ के शहर को देखा...

गाँधी मैदान में आयोजित रामलीला की थी दृश्यावली...
राम और रावण... दोनो के हाँथ में मद्पात्र...
एक-दूसरे को 'चियर्स' करते.
विनोद के क्षण को जीवंत करती जानकी
और एक कोने में कई-कई हनुमान...
चकित... लज्जित... किंकर्तव्यविमूढ़..

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:19am

आ० सुनील जी

विचार मथन से उपजी रचना संप्रेषित करने में समर्थ हुयी है . सादर

Comment by shree suneel on May 31, 2015 at 3:33am
आदरणीय मिथलेश वामनकर सर, रचना से आपको संतुष्ट पा कर उत्साहित हूँ. आपकी प्रतिक्रिया बहुमूल्य है आदरणीय. रचना पे आपने समय दिया इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.
Comment by shree suneel on May 31, 2015 at 3:23am
आदरणीय सौरभ सर, रचना पे आपकी उपस्थिति व सराहना से उत्साहित हूँ. आशा है आगे भी आपका मार्ग दर्शन प्राप्त होता रहेगा. धन्यवाद आदरणीय.
Comment by shree suneel on May 31, 2015 at 2:48am
रचना पे समय देने और बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आदरणीय केवल प्रसाद जी.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 29, 2015 at 11:16pm

चकित हूँ आपकी इस रचना पर 

जिस खूबसूरती से आपने विचारों को शब्द दिए है और जैसे बेमिसाल बिम्ब रचे है बस देख, पढ़ और समझ कर बस चकित हूँ.

बहुत दिनों बाद बढ़िया अतुकांत कविता पढने मिली 

इस रचना पर बधाई और प्रस्तुति हेतु आभार आदरणीय सुनील भाई जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 29, 2015 at 10:26pm

रचना पर आपकी पकड़ बहुत अच्छी बनी है, आदरणीय.
विषय संवेदनशील है. बिम्ब उस हिसाब से तनिक गहन हैं. इंगितों में गूढ़ता है. आज के समाज की कई विद्रूपताओं में से बहुत कुछ को समेट लेने के चक्कर में प्रवाह अवश्य बोझिल भी हो गया है. रचना विन्यास एक सीमा तक संयत है.
प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 28, 2015 at 8:52pm

आ0 सुनील भाई जी,  प्रारम्भ में मार्मिक कविता किंतु उपसंहार में किंकर्तव्यविमूढ्तावश स्थूल हो गयी. एक सुंदर विषय पर अच्छा प्रयास हुआ है. बधाई स्वीकारे.  सादर

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