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गीत -- पूछता है अब विधाता - ( गिरिराज भंडारी )

रोक नदिया

तोड़ पर्वत

तू धरा को क्या बनाता

पूछता है , अब विधाता

 

देख कुल्हाड़ी चलाता 

कौन अपने पाँव में ही

कंटकों के बीज बोता

रास्तों में , गाँव मे ही

व्यर्थ सपनों के लिये क्यों आज के सच को  गवांता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

 

इक नियम ब्रम्हाण्ड का है

ग्रह सभी जिसमें चले हैं

है धरा की गोद माँ की

खेल जिसमे सब पले हैं

माँ पहनती उस वसन में , आग कोई है लगाता 

तू धरा को क्या बनाता , पूछ्ता है अब विधाता

 

है सरलता, राज पथ सी

है तरलता एक  सच ही         

क्या विनाशक सर चढ़ा बन

चुन लिया है  पर कुपथ ही

क्यों सहज से रास्ते पर  तू अभी भी चल न पाता

तू धरा को क्या बनाता , पूछता है अब विधाता

******************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on May 14, 2015 at 10:51am
बहुत सुन्दर , प्राकृतिक सम्पदा और पर्यावरण को बचाये रखना ही समझदारी है, बहुत सार्थक प्रस्तुति, आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, बधाई, सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 14, 2015 at 10:29am

अति सुंदर, सर. सच! इन प्राकृतिक आपदाओं के चलते , एक सार्थक प्रश्न रख छोड़ा है रचना में. न जाने आज का ईश्वर कहलाये जाने वाला इंसान , इस धरा को क्या बनाना चाहता है. प्रस्तुति पर बहुत-बहुत बधाई आदरणीय गिरिराज जी

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