For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सम्बल (लघु कथा) // शुभ्रांशु पाण्डेय

भूख और थकावट से चूर दोनों असहाय भाई-बहन एक-दूसरे से लिपट कर लेट गये.

आज सुबह के भूकम्प में अपने मां-पापा को खो देने के बाद से ये छः वर्षीय भाई ही तो उसका सम्बल था.

दो वर्ष छोटी बहन को ऐसा लग रहा था जैसे अपने भाई के सीने पर सर रख देने से ही उसकी सारी समस्याओं का निदान हो गया हो.

अचानक खयाल आया, उसके भाई के लिये आखिर सम्बल कौन है ?

उसके नन्हे हाथ अनायास भाई के गालों पर फैल गये आँसुओं को साफ़ कर उसके धूल भरे बालों को सहलाने लगे. 

==================

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 774

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 27, 2015 at 10:19pm

//दूसरे, लघुकथा में अचानक खयाल आया, उसके भाई के लिये आखिर सम्बल कौन है ?  के भाव को तनिक और व्यावहारिक स्वरूप दिया जा सकता है. संभव है, भाई गणेश जी का आशय यही है.//
जी आदरणीय सौरभ भईया, आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं.

//सतत और दीर्घकालिक अभ्यास करते चलें हम. अन्यथा, कोई ’विशिष्ट पाठक’ अपनी असंवेदनशीलता के वशीभूत यह चेंपना नहीं भूलेगा कि ऐसों को कोई सुझाव देना बेकार है, जब उसको मानना ही नहीं है. जबकि बात यह है ही नहीं.//

जी भईया, ’विशिष्ट पाठक’ अपनी असंवेदनशीलता के वशीभूत कुछ भी चेप सकते हैं.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 27, 2015 at 9:36pm

आपदा की स्थितियाँ कितनी निर्मम और कैसी भयावह होती हैं कि उनके तिरोहित होते ही न केवल वातावरण की भौतिक दशा में बल्कि मनस के सहज आयाम एवं वयस-सुलभ भावुक संप्रेषणों तक में आमूलचूल परिवर्तन हो चुका होता है.
बाल मनोविज्ञान के विशेष पहलू को सामने लाती इस लघुकथा के लिए बधाई.

इस प्रस्तुति के माध्यम से मेरे दोनों अनन्य अनुजों में हुई चर्चा रोचक तो है ही, बहुपक्षीय भी है.
सत्य है, चार साल की सामान्य बच्चियाँ या छः साल के औसत बच्चे जिस उन्मुक्त अनुभवहीनता को जीते हैं, वहाँ लघुकथा में वर्णित सोच सहज गले नहीं उतरती. लेकिन आपदाग्रस्त वातावरण कोई सामान्य दशा नहीं हुआ करता, न उस दशा में व्यवहार वयस-सुलभ और सहज ही होता है. अवश्य संभव है, बच्ची के मन में वयस्कों की तरह उच्च भाव न आये हों और न उसके मन में अपने अबोध किन्तु संकेन्द्रित दिखते भाई का सम्बल बन जाने का दम बना होगा. लेकिन परिस्थितियों का दवाब अवश्य औसत सोच के परे चला गया होगा, इसमें कोई शक नहीं है. वह भी उस परिस्थिति में जब दोनों ने अपने माँ-बाप को देखते ही देखते ही खो दिया हो. उसका interpretation कोई रचनाकार अपनी संवेदना के अनुरूप करे तो सहज स्वीकार्य होना चाहिये. उन पलों का व्यवहार बाल-मनोविज्ञान की सामान्य दशा से परिचालित हो ही नहीं सकता.  

दूसरे, लघुकथा में अचानक खयाल आया, उसके भाई के लिये आखिर सम्बल कौन है ?  के भाव को तनिक और व्यावहारिक स्वरूप दिया जा सकता है. संभव है, भाई गणेश जी का आशय यही है.

सतत और दीर्घकालिक अभ्यास करते चलें हम. अन्यथा, कोई ’विशिष्ट पाठक’ अपनी असंवेदनशीलता के वशीभूत यह चेंपना नहीं भूलेगा कि ऐसों को कोई सुझाव देना बेकार है, जब उसको मानना ही नहीं है. जबकि बात यह है ही नहीं.

कुछ भी हो, आपदा की स्थितियों में बालमन की सोच के आयाम में आये परिवर्तनों को शाब्दिक किये जाने का सुन्दर प्रयास हुआ है.

शुभेच्छाएँ


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 27, 2015 at 2:10pm

....//मैं भी बच्चों का मनोविज्ञान खूब समझता हूँ. //

इसके माने क्या, भैया ?.....
माने बताने की जरुरत है क्या ? यदि हाँ तो मेरी उक्त टिप्पणी को शून्य समझे.

//तो फ़िर वो एक्स्ट्रा आर्डिनरी सोच वाली ही है भैया....हा हा हा हा//
ऐसा ! फिर तो वाह वाह, बहुत खूब, क्या बेहतरीन लघुकथा लिखी है, ढेरों बधाईयाँ.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 27, 2015 at 1:51pm

तो फ़िर वो एक्स्ट्रा आर्डिनरी सोच वाली ही है भैया....हा हा हा हा

//मैं भी बच्चों का मनोविज्ञान खूब समझता हूँ. //

इसके माने क्या, भैया ?


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 27, 2015 at 10:51am

//लेकिन किसी असामान्य घटना के बाद लोगों का स्वभाव आश्चर्यजनक रुप से बदल जाता है//

भाई जी अन्य लोगों और एक चार साल की बच्ची में अंतर है, भूकंप के बाद डर के माहौल में एक पौढ़ सोच बिलकुल गले नहीं उतरता, मैं भी बच्चों का मनोविज्ञान खूब समझता हूँ. हां यदि पात्र एक्स्ट्रा आर्डिनरी हो तो कुछ भी संभव है.

मैंने पहले भी एक बात कही है... यह संभव है कि बगैर यह सोचे वो भाई के लिए संबल बन जाय.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 27, 2015 at 10:11am

आदरणीय गणेश भैया,

एक साधारण परिवेश और वातावरण में बच्ची का इस तरह का सवाल उठाना

//अचानक खयाल आया, उसके भाई के लिये आखिर सम्बल कौन है ?//

कुछ अजीब सा लगता है.और आपका इस तरह की शंका का उठना वाजिब लगता है.

लेकिन किसी असामान्य घटना के बाद लोगों का स्वभाव आश्चर्यजनक रुप से बदल जाता है. एक चार साल की बच्ची का भूकम्प आने के बाद, जब उसके मां बाप की मृत्यु हो गयी हो, इस तरह विचार इसी बात का द्योतक है.

आशा है मेरी कथा के मनोविज्ञान को समझाने का मेरा प्रयास आपकी शंका का समाधान कर दिया होगा 

सादर.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 26, 2015 at 5:35pm

//अचानक खयाल आया, उसके भाई के लिये आखिर सम्बल कौन है ?//
महज चार वर्ष की उम्र में इतनी बड़ी बात का ख्याल आना...तनिक अटपटा लगता है शुभ्रांशु भाई. हालाकि यह संभव है कि बगैर यह सोचे वो भाई के लिए संबल बन जाय.

लघुकथा पर सुन्दर प्रयास है, बधाई इस सृजन हेतु.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 24, 2015 at 10:08pm

आदरणीय विरेन्द्र जी, 

कथा के साथ अपने आप को जोड़ने के लिये धन्यवाद.

सादर.

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on May 23, 2015 at 12:19pm

आदरणीय पाण्डेय जी ... भाव भीनी और मार्मिक रचना!.

सुन्दर प्रस्तुती के लिए सादर बधाई.!

Comment by Shubhranshu Pandey on May 22, 2015 at 9:05pm

आदरणीय श्री सुनील जी. 

कथा के साथ अपनी भावनाओं को जोड़ने के लिये आभार.

सादर.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर हमारे समूह में कोई व्यवसायी हैं और उनके पास कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड्स हों तो वे इसके…"
2 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सदस्यों में रुचि के अभाव ने इसे बंद करने के विचार का सूत्रपात किया है। ऐसा लगने लगा था कि मंच को…"
2 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" एक दुखद स्थिति बन रही है. लेकिन यह नई नहीं है. जब आत्मीयजनों और ओबीओ के समृद्ध सदस्यों की…"
2 hours ago
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"मै मंच के प्रारंभिक दिनों से ही जुड़ा हुआ हूं। इसका बंद होना बहुत दुखद होगा। मुझे लगता है कि कुछ…"
6 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय गणेश जी, जितना कष्ट आपको यह सूचना देते हुए हो रहा है, उतना ही कष्ट हम सब को यह सुनने में हो…"
6 hours ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दु:खद "
6 hours ago
Admin posted a discussion

अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....

प्रिय सदस्य गण / प्रबंधन समिति के सदस्य गण / ओ बी ओ के सभी पाठक एवं शुभचिंतक गणसादर प्रणामआप सभी…See More
8 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"हाड़-मॉंस स्ट्रेट (लघुकथा) : "नेता जी ये क्या हमें बदबूदार सॅंकरी गलियों वाली बस्ती के दौरे…"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)
"सादर नमस्कार आदरणीय मंच। इंतज़ार है साथियों की सार्थक रचनाओं का, सहभागिता का। हम भी हैं कोशिश में।"
yesterday
Admin posted a discussion

"ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-133 (विषय मुक्त)

आदरणीय साथियो,सादर नमन।."ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।प्रस्तुत…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
Apr 26

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service