कोई मांग रहा,
कोई छीन रहा।
तेरा मेरा करता मानव,
सब पा कर भी क्यों दीन रहा।
पत्थर युग से,
मंगल युग तक।
सूरत बदली मूरत बदली,
मन से फिर भी हीन रहा।
छू ले चांद,
कई बार भले।
पर धरती की अनदेखी है,
जहां बचपन कूड़ा बीन रहा।
क्षण भर 'देवी',
फिर खेल खिलौना।
धरा गगन को रोना आया,
तू ईश होकर भी,
समाधि में ही लीन रहा।
जीत लिया जग,
बना सिकंदर।
जाते जाते अपने दो क्षण,
विश्व विजेता मुर्दो का,
क्यों छीन रहा क्यों छीन रहा
'विरेन्दर वीर मेहता'
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
वाह! वाह! वाह! बेहतरीन! हार्दिक बधाई आ० मेहता जी!
बेहतरीन रचना है बहुत बहुत बधाई आपको
लाजवाब रचना है बहुत बहुत बधाई आपको सादर , |
//पर धरती की अनदेखी है,
जहां बचपन कूड़ा बीन रहा// , बहुत सुन्दर गीत हुआ है आदरणीय वीर मेहता जी , दिल से बधाई कुबूल करें..
बहोत उम्दा कविता सुन्दर
बहुत सुंदर गीत हुआ है बधाई ...तू ईश होकर भी, समाधि में ही लीन रहा।... वाह ....सादर
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