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चेहरे की रेखाओं में …

चेहरे की रेखाओं में …

जाने कैसी बेरहम हो तुम
सिसकने की वजह देकर
खामोशी से चली जाती हो
चेहरे की रेखाओं में
दर्द के रंग भर जाती हो
स्मृति के किसी कोने में कुछ दृश्य
मेरे अन्तःमन को विचलित कर जाते हैं
और मैं बेबस निरीह सा
अपने सर को झुकाये
काल्पनिक लोक के दृश्यों से
स्वयं को जोड़ने का
बेवजह प्रयत्न करता हूँ
जानता हूँ कि उन दृश्यों से
एकाकार असंभव है
फिर क्योँ तेरी प्रतीक्षा करूं
क्योँ तुझसे स्नेह करूं
ऐ नींद !
ये कटु सत्य है
तुम जब भी आओगी
अपने साथ
कभी पूरे न होने वाले स्वप्न भी लाओगी
फिर एक टीस दे कर
चुपचाप चली जाओगी
न,न
अपनी पलकों पर
मैं अब तुम्हें दस्तक न देने दूंगा
अपूर्णता के अश्रुओं से
अपने नयनों का श्रृंगार न होने दूंगा
निराशा से
स्वयं का एकाकार न होने दूंगा

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 387

Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 6, 2015 at 7:02pm

आदरणीय सौरभ जी रचना पर आपकी स्नेहिल एवं समीक्षात्मक उपस्थिति का हृदयतल से आभार। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 6, 2015 at 3:16am

नींद को इंगित करती इस अभिव्यक्ति केलिए बधाई, आदरणीय.

वैसे यह रचना अभिव्यक्ति के लिहाज से पहले स्तर की ही है. आपकी रचनाओं से अब गहन संप्रेषणीयता की अपेक्षा होती है आदरणीय.

Comment by Sushil Sarna on June 24, 2015 at 12:05pm

आदरणीय  krishna mishra 'jaan'gorakhpuri जी रचना को आत्मीय सम्मान देने के लिए हार्दिक आभार।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 21, 2015 at 9:15am

सहज शब्दों में बेहतरीन अभिव्यक्ति!..बहुत सुन्दर आ० सुनील सर!

Comment by Sushil Sarna on June 19, 2015 at 12:54pm

आदरणीय डॉ गोपाल जी रचना को आत्मीय सम्मान देने के लिए हार्दिक आभार। आपके द्वारा इंगित त्रुटि वस्तुतः टंकण दोष है जिसे सुधार कर मैंने पुनः प्रेषित कर दिया है। इस हेतु मैं आपका तहे दिल से आभारी हूँ सर।  

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 18, 2015 at 5:54pm

हमेशा की तरह बेजोड़ , रखाओ  क्या रेखाएं ही हैं या कुछ और .

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