For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

भूख(लघु कथा, मनन कु॰ सिंह)

भूख(लघु कथा)
आखिरी बस जा चुकी।सन्नाटा पसर चला।उसे चूल्हे की आग बुझती-सी लगी,पर यूँ ही बैठी रही।अचानक उसका ध्यान भंग हुआ,
--बस छूट गयी क्या?
दूकान बंद करते पानवाले ने पूछा।
-नहीं,बस यूँ ही---उसने मुड़कर पीछे देखा।पानवाला उसे अंदर तक घूरता-सा लगा।
--अब कोई नहीं आयेगा,चल न मेरे यहाँ आज।
--नहीं,घर में बच्चे भूखे होंगे,और फिर तेरी घरवाली.........?
-मैके चली गयी है।बगल के बटोही के साथ धर लिया था उसे एक दिन।
फिर नजरें मिलीं।लगा रोशनी फैलने लगी, अब चूल्हे जल जायेंगे।उसने अपना आँचल सहेजा।दोनों अँधेरे में गुम हो गये।
'मौलिक व अप्रकाशित'

Views: 899

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Manan Kumar singh on July 26, 2015 at 8:23am
सीखना तो हर उम्र पर लागु है और शब्दों को उनकी सीमा में रहने देना शायद या निश्चित तौर पर आदमी क व्यक्त करता है।मेरी समझ में शब्द सार्थक अभिव्यक्ति हेतु उद्भुत हुए थे न कि वैसे ही फेंककर चल देने के लिए।जहाँ तक इग्नोर करने की बात है तो मैं कहूँगा कई यह आत्म केंद्रित हो जाने की वैसी स्थिति है जहाँ व्यक्ति कभी कभी स्वयं भी इग्नोर होने की दशा प्राप्त कर लेता है,इग्नोरेंस की तरफ भी यह व्यक्ति ओ घसीटता है।और कुछ भी कहने मेंभाषागत शुद्धि तो ललाजिमी है ही,हम-आप कितना जानते हैं,इससे ज्यादा जरुरी है कि जो लिख रहे हैं वह कम से कम भाषा की गरिमा में हो,सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 20, 2015 at 11:51am

सभी सचेत रचनाकारों की प्रस्तुतियों और टिप्पणियों पर हमारी (प्रबन्धन की) यथोचित दृष्टि रहती है. आपकी रचनाओं और टिप्पणीयों पर, विश्वास करें, अब विशेष दृष्टि रहेगी.

आप रचनाकर्म के मर्म को, भाईजी, समझना चाहते हैं तो समझें और सीखें कोई उज़्र नहीं है. लेकिन यह भी मान कर चलिये कि यह साहित्यिक मंच होने के साथ-साथ एक पारिवारिक एवं सर्वसमाही मंच है और हर उम्र और समझ के रचनाकार सीखते-समझते हैं. साहित्य और सामाजिक-पारिस्थिक दशा के अंतर्गत एक सीमा तक हर तरह के मनोवैज्ञानिक व्यवहार को शाब्दिक करना अनुमन्य है. इसके आगे बहुत कुछ देखना अनिवार्य हो जाता है.  इसे कोई (आप भी) व्यक्तिगत आग्रह न समझ कर मंच के वातावरण की आवश्यकता समझें.

विश्वास है, मेरे कहे के प्रति संवेदनशील मंथन करेंगे. ऐसी  ’फ्लैशी’ टिप्पनियाँ हमने इन पाँच वर्षों में सैकड़ों की संख्या में.. खूब.. देखी हैं और बेहतर ढंग से इग्नोर किया है.
सादर

Comment by Manan Kumar singh on July 20, 2015 at 9:23am
टिप्पणियों पर.......सही होगा,टिप्पणियाँ पर में कारक दोष आ गया है और दूसरी बात है कि जो चीज औरों को जरुरी लगती है वह किसीको गैर जरुरी लग सकती है,इसमें कोई अचरज भी नहीं।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 19, 2015 at 11:56pm

किसकी कैद ?

जब कायदे से प्रस्तुतियाँ आने लगे तो टिप्पणियों पर हवाबाज़ी अच्छी लगती है..

Comment by Manan Kumar singh on July 19, 2015 at 8:38pm
अभी तक शायद विषयों का सीमांकन नहीं हुआ है और आवश्यक/अनावश्यक की परख तो अब जैसे कैद होकर रह गयी हो,सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2015 at 11:59pm

भूख की बेबसी में उठे कदम को कोई और क्या शब्द दे ?  वैेसे इतनी बार इतने अच्छे ढंग से इन्हीं परिस्थितियों को ’पढ़’ चुका हूँ कि इसके अलावा किसी शीर्षक और कथ्य पर अभ्यासरत होते देखना अच्छा लगता. यों भी अनावश्यक एडल्ट कथ्य बहुत आकर्षित नहीं करता.

धन्यवाद ..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on June 28, 2015 at 3:58am

मजबूरी को अभिव्यक्त करती प्रभावकारी और सफल लघुकथा 

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन जी 

Comment by Manan Kumar singh on June 26, 2015 at 11:58pm

आभार गिरिराज भाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 12:20pm

हाय री इंसान की मज़बूरियाँ !! बहुत सुन्दर , लघुकथा के लिये बधाई ।

Comment by Manan Kumar singh on June 25, 2015 at 5:45am

आदरणीय हरि भाई, मुकेश भाई,विनय भाई एवं वीरेंद्र भाई, आप सबने लघु को मान दिया इसके लिए आप सबका ढेर -सा आभार।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Chetan Prakash commented on सुरेश कुमार 'कल्याण''s blog post भादों की बारिश
"यह लघु कविता नहींहै। हाँ, क्षणिका हो सकती थी, जो नहीं हो पाई !"
Tuesday
सुरेश कुमार 'कल्याण' posted a blog post

भादों की बारिश

भादों की बारिश(लघु कविता)***************लाँघ कर पर्वतमालाएं पार करसागर की सर्पीली लहरेंमैदानों में…See More
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . . विविध

मंजिल हर सोपान की, केवल है  अवसान ।मुश्किल है पहचानना, जीवन के सोपान ।। छोटी-छोटी बात पर, होने लगे…See More
Monday

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय चेतन प्रकाश भाई ग़ज़ल पर उपस्थित हो उत्साह वर्धन करने के लिए आपका हार्दिक …"
Monday

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय सुशील भाई  गज़ल की सराहना कर उत्साह वर्धन करने के लिए आपका आभार "
Monday

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - चली आयी है मिलने फिर किधर से ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय लक्ष्मण भाई , उत्साह वर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार "
Monday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-182
"विगत दो माह से डबलिन में हूं जहां समय साढ़े चार घंटा पीछे है। अन्यत्र व्यस्तताओं के कारण अभी अभी…"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-182
"प्रयास  अच्छा रहा, और बेहतर हो सकता था, ऐसा आदरणीय श्री तिलक  राज कपूर साहब  बता ही…"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-182
"अच्छा  प्रयास रहा आप का किन्तु कपूर साहब के विस्तृत इस्लाह के बाद  कुछ  कहने योग्य…"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-182
"सराहनीय प्रयास रहा आपका, मुझे ग़ज़ल अच्छी लगी, स्वाभाविक है, कपूर साहब की इस्लाह के बाद  और…"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-182
"आपका धन्यवाद,  आदरणीय भाई लक्ष्मण धानी मुसाफिर साहब  !"
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-182
"साधुवाद,  आपको सु श्री रिचा यादव जी !"
Sunday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service