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बन्धन (लघु कथा)// शुभ्रांशु पाण्डेय

“दोनो पैरों के अँगूठों में बन्धी रस्सी भी खोल दो, चिता पर कोई भी गाँठ या बन्धन नहीं होता..”
“चिता पर सारे बन्धन खत्म हो जाते हैं” - किसी और ने कहा.

सुनते ही राकेश पत्नी प्रिया और उसके बीच के सबसे बडे़ बन्धन एक साल के बेटे को अपने सीने से लगाये प्रिया के निर्जीव शरीर को चुपचाप देखता हुआ फिर से फ़फ़क पड़ा.
*************************
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on July 8, 2015 at 7:28pm
इसे लघु कथा से ज्यादा लघुतम कथा कहना अतिश्युक्ति नहीं होगी इतने कम शब्दों में विशाल अभिव्यक्ति आदरणीय।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 7:23pm

कहन और विन्यास दोनों गठे हुए हैं. ’बन्धन’ शीर्षक पर इतना मार्मिक लघकथा हुई है कि बरबस मुँह से वाह निकल उठता है. हार्दिक बधाई स्वीकार करें, शुभ्राशु भाई. 

शुभकामनाएँ

Comment by Shubhranshu Pandey on July 5, 2015 at 10:05am

आदरणीय ओमप्रकाश जी, 

कथा पर अपने विचार देने के लिये आभार.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 5, 2015 at 10:04am

आदरणीय गोपाल जी,

रचना पर आये और विचार दिया इस बात के लिये आभार.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 5, 2015 at 10:03am

आदरणीय जवाहर लाल जी, 

कथा आपके मन और हृदय को स्पर्श कर सकी. 

रचना सफ़ल रही.रचना पर अपने विचार देने के लिये आभार.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 5, 2015 at 9:57am

आदरणीय maharshi tripathi जी, 

कथा पर आने के लिये आभार. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 3, 2015 at 8:55pm

आदरणीय मिथिलेश जी, 

आपके विचार की प्रतिक्षा रहती है. रचना पर आने के लिये आभार. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 3, 2015 at 8:53pm

आदरणीय डा आशुतोष जी, 

रचना पर आने और अपने विचार देने के लिये आभार. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 3, 2015 at 8:41pm

आदरणीय कृष्ण जी, 

रचना पर आने के लिये आभार. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 3, 2015 at 8:21pm

आदरणीया राजेश जी, 

कथा पर अपने विचार देने के लिये आभार. आत्मिक बन्धन तो व्यक्तिगत होते हैं. बान्धने और बन्धने वाले के परस्पर सम्बन्ध पर निर्भर करता है. एक बार पुनः रचना पर आने के लिय धन्यवाद.

सादर.

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