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स्वांग धरे तरै तरै
कुरता और टोपी धरे
देखो कैसे कैसे आए
संसद भवन में

बातें करे बड़ी बड़ी
जनता की है किसे पड़ी
वही तो नेता कहाए
संसद भवन में

राज राज करे बस
नीति सारी भूल जाएँ
हैं सारे छंटे-छंटाये
संसद भवन में

भूख से हैं मरते जहाँ
हजारों औ लाखों लोग
ये बिना डकारे खाएं
संसद भवन में

इसे खरीद, उसे बेच, इसे जोड़, उसे तोड़
जैसे तैसे करके, लेते ये आकार हैं
ऐसे में भलाई की सुधि कब कौन लेवे
कहते हैं गठबंधन है, हम लाचार हैं
तुम्हारी तो परवाह करेंगे थोड़ा रुक कर
हाल-फिलहाल तो बचानी सरकार है
तुमने चुना, और चुनो, अब बैठे सर धुनों
पाँच साल हम बिताएं, संसद भवन में

कोई पांचवी है फ़ैल, कोई बीए एमए पास
अन्दर तो लगते सारे जाहिल गंवार हैं
इसने कही उसने सुनी, हो गई जो कहासुनी
हो जाती है गुत्थमगुथ्था, जूतमपैजार है
देख कर ये दृश्य सारे, अपने टीवी सैटों पर
देश की ये जनता होती कितनी शर्मसार है
शीत हो या मानसून सत्र, प्रश्न हो या शून्यकाल
मच्छी बाजार नजर आए संसद भवन में

चौरासी हो, बाबरी हो, बॉम्बे हो या हैदराबाद
कहीं न कहीं सबके अन्दर ही सूत्रधार हैं
कोई रचे नंदीग्राम, कहीं कोई और संग्राम
सारे के सारे इनके महान शाहकार हैं
बिना लाज, बिना शर्म, करते जाएँ ऐसे करम
देश की जनता से नहीं, इनको सरोकार है
निर्ममता से मरवाते हैं, जैसे ये निर्दोषों को तो
क्यूँ हम इनको भेजे जाएँ संसद भवन में

दुष्यंत............

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on September 6, 2011 at 3:21pm

bahut sahi chitran hai aaj ke yathaarth kaa dushyant ji ye kavita aaj ki paristhiti men janta ki awaaz hai haardik badhai !!

Comment by satish mapatpuri on June 11, 2010 at 3:29pm
कोई पांचवी है फ़ैल, कोई बीए एमए पास
अन्दर तो लगते सारे जाहिल गंवार हैं
इसने कही उसने सुनी, हो गई जो कहासुनी
हो जाती है गुत्थमगुथ्था, जूतमपैजार है
देख कर ये दृश्य सारे, अपने टीवी सैटों पर
देश की ये जनता होती कितनी शर्मसार है
शीत हो या मानसून सत्र, प्रश्न हो या शून्यकाल
मच्छी बाजार नजर आए संसद भवन में
बहुत ही सुन्दर ------------ धन्यवाद.
Comment by Rash Bihari Ravi on June 11, 2010 at 1:40pm
khubsurat rachna
Comment by Admin on June 11, 2010 at 11:55am
बातें करे बड़ी बड़ी
जनता की है किसे पड़ी
वही तो नेता कहाए
संसद भवन में
दुष्यंत जी आपने तो धो डाला है ओ भी बिना डिटर्जेंट के , आपकी रचना मे आम जनता की सोच साफ़ झलकती है की वो क्या सोचते है इन नेताओ के बारे मे, जब तक इन निति बनाने वालो का नियति साफ़ नहीं होगा इनकी छवि नहीं सुधरेगी, बहुत ही ससक्त अभिव्यक्ति है दुष्यंत जी , बधाई स्वीकार करे,
Comment by दुष्यंत सेवक on June 11, 2010 at 11:51am
is rachna ko aadarneeya swargiya shri omprakash aditya ki lay me likhne ki koshish ki hai....

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