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बह्र : हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २

 

हुस्न का दरिया जब आया पेशानी पर

सीख लिया हमने भी चलना पानी पर

 

राह यही जाती रूहानी मंजिल तक

दुनिया क्यूँ रुक जाती है जिस्मानी पर

 

नहीं रुकेगा निर्मोही, मालूम उसे

फिर भी दीपक रखती बहते पानी पर

 

दुनिया तो शैतान इन्हें भी कहती है

सोच रहा हूँ बच्चों की शैतानी पर

 

जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती

गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on July 8, 2015 at 8:11am
वाह वाह वाह वाह वाह चाहे कितनी भी बार वाह वाह करूं पर इस गजल की तारीफ में कम होगी। हर शे'र दिल पर उतर गया।
राह यही जाती रूहानी मंजिल तक
दुनिया क्यूँ रुक जाती है जिस्मानी पर

कितनी सच्चाईं है इस शे'र में मेरी मन बात आप की कलम से कागज पर उतर के मुझे घूर रहीं है आदरणीय । इस शे'र के लिए तो मैं आपका आभारी हूँ।
Comment by विनय कुमार on July 8, 2015 at 12:43am

// जब देखो तब अपनी उम्र लगा देती
गुस्सा आता है माँ की मनमानी पर // , इस आखिरी शेर में तो कमाल हो गया , बधाई आपको..

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 7, 2015 at 5:23pm

आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार जी उम्दा शेर हुए हैं बधाई ...सादर 

Comment by Pari M Shlok on July 7, 2015 at 11:22am
बहुत सुन्दर ग़ज़ल

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