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अपने अधरों से ....

अपने अधरों से ....

अपने अधरों से अधरों पर कोई कथा न लिख जाना
अंतर्मन के प्रेम सदन की कोई व्यथा न लिख जाना

श्वास  सुरों  में स्पंदन तुम्हारा
स्मृति  भाल पे चंदन  तुम्हारा
प्रेम  पंथ  की मन  कन्दरा  में
कोई विरह प्रथा न लिख जाना

अपने अधरों से अधरों पर कोई कथा न लिख जाना
अंतर्मन के प्रेम सदन की कोई व्यथा न लिख जाना

संचित पलों  की  मृदुल अनुभूति
अभी रक्ताभ अधरों पर जीवित है
तुम नीर भरे नयनों के भाग्य में
कोई अमिट क्षुधा न लिख जाना

अपने अधरों से अधरों पर कोई कथा न लिख जाना
अंतर्मन के प्रेम सदन की कोई व्यथा न लिख जाना

जिस की साँसों की सुरभि का
रजनी करती मधुर अभिनंदन
भुजबंध के उन स्नेह क्षणों में
कोई अतृप्त तृषा न लिख जाना

अपने अधरों से अधरों पर कोई कथा न लिख जाना
अंतर्मन के प्रेम सदन की कोई व्यथा न लिख जाना

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 26, 2015 at 12:09pm

आदरणीय   Harash Mahajan जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Harash Mahajan on July 25, 2015 at 9:06pm

बहुत ही सुंदर भाव सुशील जी ...बहुत बहुत बधाई !!

Comment by Sushil Sarna on July 24, 2015 at 4:06pm

आदरणीय   maharshi tripathi  जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by maharshi tripathi on July 23, 2015 at 10:33pm

सुन्दर ,भाव पूर्ण रचना पर आपको बधाई आ. Sushil Sarna जी |

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