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ग़ज़ल- काश अपना भी घौंसला होता।

२१२२ १२१२ २२

काश अपना भी' घौंसला होता।
मैं किसी घर का' लाडला होता।

माँ पिता जी की' गोद में मैं भी।
खेलता कूदता पला होता।

वासना को कहें मुहब्बत सब।
अब नहीं इश्क बावला होता।

शक्ल से तो बडा भला है वो।
काश दिल से जरा भला होता।

उम्र तन्हाँ न यूँ गुजरती गर।
इक कदम का भी' हौसला होता।

मैं न कहता कभी खुदा से दोस्त।
आज इंसाफ अगर चला होता।

शुक्र है वो यहाँ नहीं वरना।
जलजला और जलजला होता।

इस जमीं तक कभी न आता मैं।
इश्क में जो नहीं जला होता।

श्याम काले थे' राम जी काले।
रंग मेरा भी' साँवला होता।

नफरतों से भरा जहाँ 'राहुल'।
अच्छा' होता कि खोखला होता।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by Rahul Dangi Panchal on July 28, 2015 at 2:39pm
शुक्रिया आदरणीय मनोज भाई जी । खुशी हुई यह सुनकर कि इश्क बावला अब भी है बेशक गुमनाम हो। सादर धन्यवाद
Comment by मनोज अहसास on July 28, 2015 at 2:30pm
वाह वाह
वाह
दो दिन पहले इस बहर की एक ग़ज़ल गुनगुना रहा था
और आज आपकी ग़ज़ल सुनी
मन भर गया
लेकिन
इश्क़ अब भी बावला है
थोडा थोडा आप में और
ज़रा सा हममे दिखाई देता है
सादर
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 28, 2015 at 2:28pm
आदरणीय शिज्जू जी बहुत दिन के बाद आपकी टिप्पणी देखकर बहुत खुशी हुई ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 28, 2015 at 2:23pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी, आदरणीय शिज्जू जी,आदरणीया कान्ता जी बहुत बहुत आभार ।
निवेदन है यह स्नेह हमेशा बनाए रखे और मेरा मार्ग दर्शन करतें रहें।
मंच को निजि कारणो से कम समय दे पा रहा हूँ इसके लिए क्षमा ।

गजल को संशोधित किया है क्रपया एक नजर और डाले ।
सादर नमन।
Comment by kanta roy on July 28, 2015 at 9:19am
शक्ल से तो बडा भला है वो।
काश दिल से जरा भला होता।.......... काले दिल वालों के लिए क्या बात कही है आपने ..... वाह !! वाह !!

श्याम काले थे' राम जी काले।
रंग मेरा भी' साँवला होता....... वाह !!!!!!! बहुत खूब । क्या मिजाज उभरे है इस साँवलेपन के ........ बहुत खूब गजल बनी है बधाई आपको आदरणीय राहुल दांगी जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 27, 2015 at 8:54pm

आदरणीय राहुल जी आपकी ग़ज़ल में बहुत सुधार आया है, बह्र को आपने खूब साधा है, कहन भी अच्छी हुई है मेरी तरफ से दाद कुबूल फरमायें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 27, 2015 at 4:38pm

आदरणीय राहुल भाई जी छोटी बह्र में लाजवाब ग़ज़ल हुई है. मज़ा आ गया इसे गुनगुनाकर. दाद दाद ढेर सारी दाद ...... और ये दो अशआर तो कमाल हुए है---

शुक्र है वो यहाँ नहीं वरना।
जलजला और जलजला होता।


श्याम काले थे' राम जी काले।
रंग मेरा भी' साँवला होता।

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 27, 2015 at 2:02pm
आदरणीय गिरीराज जी, आदरणीय हर्ष जी शुक्रिया
Comment by Harash Mahajan on July 27, 2015 at 1:53pm

आदरणीय Rahul Dangi जी आपकी ग़ज़ल का हर शेर दिल छूता हुआ निकलता है सर बहुत बहुत बधाई | साभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 27, 2015 at 1:12pm

आदरणीय राहुल भाई , गज़ल बहुत सुन्दर लगी , हार्दिक बधाई आपको ।

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