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दर्द होता अब नया है
मर्ज तू ही,तू दवा है।
बात तेरी पुरशकूं बस,
और सारी तो हवा है।
बादलों से माँगकर,लो
बेखुदी मन दे गया है।
ओढ़ ले या ले पहन तू
वक्त तेरा हो गया है।
मेघमाला सी बरस तू
खेत धानी रो रहा है।
देख तेरा ही जगाया,
अब सपन भी सो गया है।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on July 30, 2015 at 7:54pm
आदरणीय समर जी,मिथिलेश जी व आशुतोष जी आभार आपका। मिथिलेश जी जरुरी संशोधन भी हुआ है,सादर।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 30, 2015 at 2:21pm
आदरणीय मनन जी ..छोटी बह्र पर बहुत ही सुंदर ग़ज़ल इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 28, 2015 at 11:48am

आदरणीय  मनन जी, छोटी बह्र की बढ़िया ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाए. आदरणीय समर कबीर जी की इस्लाह बहुत बढ़िया है. एक और निवेदन --

मेघमाला सी बरस तू
खेत धानी रो रहा है।

Comment by Samar kabeer on July 28, 2015 at 11:38am
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

"ओढ़ लो या लो पहन ही"

इस मिसरे को इस तरह कर लें :-

"ओढ़ ले या तू पहन ले"

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