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संशोधित तरही गज़ल
२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

नींदों से जब मिलकर आये कुछ पल बैठ कयाम किया
ऐसा करके सपनों ने भी कुछ तो मेरा काम किया
कब ये दुनिया औरत को घर अपने का हिस्सा माने
मर्द की जेब को हर पल देखा सुबह व् शाम सलाम किया
मुझ को अक्सर आके वो बातें ऐसी बदलाती है
रौशन कैसे दुनिया होगी न अँधेरा नाकाम किया
हर पल उसके पास रहूँ मैं,फिर भी गुम हो जाती है
साथ तो उसका पाया अक्सर याद मेंरी गुमनाम किया
बीत गई जिंद सोच में उलझे कैसे होती तो फुर्सत
रात को रो रो सुबह किया या दिन को ज्यों त्यों शाम किया

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2015 at 11:59pm

संशोधन के बाद आयोजन की ग़ज़लें संकलन वाले पोस्ट पर ही प्रतिक्रिया के रूप में रखी जाती है. और संचालक महोदय से निवेदन किया जाता है कि सुधरे रूप को मूल (चिह्नित) ग़ज़ल से प्रतिस्थापित कर दिया जाय.

Comment by मोहन बेगोवाल on August 4, 2015 at 11:29pm

    आदरणीय सौरभ जी, जब भी मेरे से  कही गज़ल चिन्हित के साथ होती तो मुझे ये पता नहीं चलता था कि इस को संशोधित कर इस्लाह के लिए कहाँ रखूं , इस बार मैने ब्लॉग में पोस्ट की तो साथ संशोधित भी लिख दिया , 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2015 at 10:53pm

आदरणीय, इस प्रस्तुति का उन्वान आपने ’संशोधित तरही’ ग़ज़ल क्यों रखा है ? 

कृपया ध्यान दे...

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