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ग़ज़ल :यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे /श्री सुनील

2122 1212 22

यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे तब हम पर
तुम बहुत जाँ फ़िशाँ थे तब हम पर

उन दिनों खेलते थे तारों से
तुम हुए आस्मां थे तब हम पर

मन मुताबिक़ जहाँ में जी लेंगे
त़ारी कितने गुमां थे तब हम पर.

याद आई गली वो रूस्वाई
चीखते सब दहां थे तब हम पर.

हम तरद्दुद न इश्क़ के मानें
वो जुनूं हाँ जी हाँ थे तब हम पर.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by shree suneel on August 12, 2015 at 4:26pm
आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी, ग़ज़ल पे आने और इस शे'र को खा़स तौर से पसंद करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर.
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 11, 2015 at 5:48pm

आदरणीय सुनील जी मन मुताबिक़ जहाँ में जी लेंगे
त़ारी कितने गुमां थे तब हम पर. इस ग़ज़ल के इस शेर के लिए बिशेष रूप से दाद स्वीकार करें सादर 

Comment by shree suneel on August 11, 2015 at 4:50pm
आदरणीय गिरिराज सर जी, ग़ज़ल पे आपकी उपस्थिति व सकारात्मक प्रतिक्रिया से प्रसन्नता हुई. ग़ज़ल को मान देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर. सादर
Comment by shree suneel on August 11, 2015 at 4:19pm
आदरणीय समर कबीर सर जी, आपसे मिली प्रशंसा पुरस्कार है. हौसला बढ़ता है. ग़ज़ल के प्रति यकीन बढ़ जाता है.
सराहना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय.
Comment by shree suneel on August 11, 2015 at 4:04pm
ग़ज़ल पे आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से खुश हूँ. इस सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय रवि शुक्ला जी. सादर
Comment by shree suneel on August 11, 2015 at 3:52pm
सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथलेश वामनकर सर. सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 11, 2015 at 10:24am

आदरनीय श्री सुनील भाई ,

मन मुताबिक़ जहाँ में जी लेंगे
त़ारी कितने गुमां थे तब हम पर.  --  बहुत सुन्दर बात कही ! गज़ल के लिये और इस शे र के लिये दिली मुबारकबाद आपको ।

Comment by Samar kabeer on August 10, 2015 at 11:25pm
जनाब श्री सुनील जी,आदाब,वाह ,मज़ा आ गया ग़ज़ल सुन कर ,दिल बाग़ बाग़ हो गया ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by Ravi Shukla on August 10, 2015 at 1:01pm

आदरणीय सुनील जी छोटे छोटे शेर में गहरी गहरी बात बहुत खूब

बढि़या ग़ज़ल के लिये बधाई स्‍व्‍ीकार करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 10, 2015 at 12:36pm

आदरणीय सुनील जी बढ़िया ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं. सादर 

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