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ग़ज़ल : हम जिन्दा भी हैं मुर्दा भी

बह्र : २२ २२ २२ २२

 

श्रोडिंगर ने सच बात कही

हम जिन्दा भी हैं मुर्दा भी

 

इक दिन मिट जाएगी धरती

क्या अमर यहाँ? क्या कालजयी?

 

उस मछली ने दुनिया रच दी

जो ख़ुद जल से बाहर निकली

 

कुछ शब्द पवित्र हुए ज्यों ही

अपवित्र हो गए शब्द कई

 

जिस दिन रोबोट हुए चेतन

बन जाएँगें हम ईश्वर भी

 

मस्तिष्क मिला बहुतों को पर

उनमें कुछ को ही रीढ़ मिली

 

मैं रब होता, दुनिया रचता

इस से अच्छी, इस से जल्दी

----------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 21, 2015 at 10:20am
आदरणीय मनोज जी, समर्थन से क्या आपको सरकार बनानी है। :)))। भाई हम दोनों अपना अपना दृष्टिकोण रखने के लिए स्वतंत्र हैं और हमें एक दूसरे की इस स्वतंत्रता की इज़्ज़त करनी चाहिए। वो कहते हैं न "let us agree to disagree".
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2015 at 10:24pm

बहुत बहुत  शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2015 at 10:24pm

बहुत बहुत शुक्रिया मनोज कुमार जी। अन्यथा लेने जैसी कोई बात नहीं है। मैं अपनी बात कह रहा हूँ तो आपको भी अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 20, 2015 at 6:27am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , खूबसूरत ग़ज़ल कही है , नया चिंतन , नई सोच के साथ ।

कुछ शब्द पवित्र हुए ज्यों ही

अपवित्र हो गए शब्द कई    --  क्या बात है , सलाम इस सोच को । गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 19, 2015 at 7:03pm

आदरणीय जवाहर लाल जी, बात को बहुत सारे तरीकों से कहा जा सकता है, ये सच है। लेकिन मुझे कौन से तरीके से कहना है ये तो मैं ही चुनूँगा न। :)

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 19, 2015 at 7:02pm

आदरणीय मिथिलेश जी,

मुझे तो आज तक इस ब्रहांड के, इस दुनिया के होने का ही तात्पर्य समझ में नहीं आया। :)

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 19, 2015 at 12:15pm

किसी बात को किन तरीकों से कहा जा सकता है... मैं तो यही समझ पाया बाकी तो गुनीजन हैं ही... 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 19, 2015 at 11:34am

आदरणीय बड़े भाई धर्मेन्द्र जी शेर का तात्पर्य तो मैं समझ गया मगर इसके होने का तात्पर्य नहीं समझा. कहा जाता है कि हम ब्रह्म है इस हिसाब से सभी रब ही तो है तब 

किसने रोका, दुनिया रच दो 

इस से अच्छी, इस से जल्दी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 19, 2015 at 9:59am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया राजेश कुमारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 19, 2015 at 9:59am

शुक्रिया आदरणीय दिनेश कुमार जी

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