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ग़ज़ल : उनकी आँखों में झील सा कुछ है

बह्र : २१२२ १२१२ २२

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उनकी आँखों में झील सा कुछ है

बाकी आँखों में चील सा कुछ है

 

सुन्न पड़ता है अंग अंग मेरा

उनके हाथों में ईल सा कुछ है

 

फैसले ख़ुद-ब-ख़ुद बदलते हैं

उनका चेहरा अपील सा कुछ है

 

हार जाते हैं लोग दिल अकसर

हुस्न उनका दलील सा कुछ है

 

ज्यूँ अँधेरा हुआ, हुईं रोशन

उनकी यादों में रील सा कुछ है

--------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 848

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:55pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जवाहर लाल जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:44pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:43pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:43pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया कान्ता जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:42pm

शुक्रिया महिमा जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:42pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on August 27, 2015 at 9:41pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ जनाब समर साहब।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 26, 2015 at 9:01pm

वाह वाह! आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार जी!

Comment by Ravi Shukla on August 26, 2015 at 2:38pm

आदरणीय धर्मेन्‍द्र जी । वाह बहुत खूब ग़ज़ल कही है आपने अंग्रेजी शब्‍द जो हमारी जुबान में घुल मिल गये है  उनका सुन्‍दर प्रयोग किया है । श्‍ोर दर शेर दाद कुबूल करें । सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2015 at 10:52am

उनकी आँखों में झील सा कुछ है

बाकी आँखों में चील सा कुछ है   ---  आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , खूबसूरत मतला और खूबसूरत गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

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