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भयंकर भूल – (लघुकथा)

 महाराज युधिष्ठिर अपने  कक्ष में   सामंतों के साथ व्यस्त थे!तभी बाह्य द्वार पर युद्ध विजय के विजय घोष और शंख, नगाडे,ढोल आदि वाद्यों की आवाज़ हुई!युधिष्ठिर बाहर आये तो देखा कि लघु भ्राता भीम वाद्य-यंत्र वादकों को  निर्देश दे रहे थे!

"भ्राता भीम, अभी कोई युद्ध नहीं हुआ और ना  कोई युद्ध विजय  तो यह वाद्य यंत्र क्यों बजाये जा रहे हैं"!

"महाराज, क्षमा करें, आज आपने युद्ध से भी बडी विजय प्राप्त की है"!

"हम आपका आशय समझने में असमर्थ है, भ्राता भीम"!

"महाराज, अभी आपके पास जो विप्र आये थे, आपने उनको कल आने का आदेश दिया , इसका तात्पर्य यह हुआ कि आपने काल पर विजय प्राप्त कर ली, आप तो काल-जयी हो गये, अतः  विजय घोष तो होना ही चाहिये"!

"भ्राता भीम, आपने हमारी आंखें खोल दी, हम भयंकर भूल करने जा रहे थे!

हम स्वयं  विप्र महोदय के पास जायेंगे , क्षमा मांगेगे एवम उनकी समस्या हल करेंगे"!

.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by TEJ VEER SINGH on September 4, 2015 at 10:34am

हार्दिक आभार आदरणीय रवि प्रभाकर जी!यह जानकर हृदय पुलकित हो गया कि आप मेरी क्षमताओं और काबलियत को लेकर इतने सचेत हैं!आपके मार्ग दर्शन का सदैव उत्सुक रहूंगा और आभारी भी!सादर!

Comment by TEJ VEER SINGH on September 4, 2015 at 10:27am

हार्दिक आभार आदरणीय मिथिलेश जी!

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 3, 2015 at 6:06pm
आदरणीय रवि प्रभाकर जी , आपकी टिप्पणी पढ़ी , लघु-कथा का बहुत सुन्दर परिचय प्रस्तुत किया है आपने , बधाई। पर कहीं एक बात यह भी जहन में आती है कि क्या लघु-कथा के कटाक्ष, तंज या अनायास अवाक कर देने वाले वाक्य हमारे ऊपर एक पर्याप्त छाप छोड़ जाते हैं ?
विषय विवाद का हो सकता है,पर उत्तर है , शायद नहीं।हम पढ़ते हैं और बस , भूल जाते हैं . आज जो टी ० वी ० न्यूज में दिन भर परोस रहा है वह व्यंग पर व्यंग है। कभी लोगों ने व्यंग / कटाक्ष से बहुत कुछ सीखा और हासिल किया पर आज कल तो जैसे वही लोग प्रेरणा बनते जा रहे हैं। टी ० वी ० उनकों इतना कवरेज देता है कि नयी पीढ़ी के सामने वे नायक होकर उभर रहे हैं। आज ही मेरे पास वाट्स अप पर एक व्यंग आया है, एक बच्चा अपनी टीचर के यह पूछे जाने पर कि उसका रोल मॉडल कौन है , कहता है , " इन्द्राणी मुखर जी।"
बहस बहुत हो सकती है , वह भी अंत हीन। निरर्थक , बिना किसी निर्णय पर पहुंचे। पर क्या विचारणीय नहीं है कि हम लोक- कथायें , बोथ-कथाएं और प्रेरक प्रसंग का भी एक कोना (चैप्टर ) रक्खें , विचार करना चाहें।
प्लेटो ने कहा था , " मुझे लोक -कथाएँ लिखने दो , मुझे इसकी चिंता नहीं है कि देश का क़ानून बनाता है।"
सादर।
Comment by Ravi Prabhakar on September 3, 2015 at 5:46pm

आदरणीय तेजवीर भाई जी आपकी विनम्रता के लिए धन्‍यवाद । सच तो यह है कि हम सभी शिक्षार्थी है हां कोई नर्सरी कक्षा का है और कोई प्रथम कक्षा का । लघुकथा का पुराना शिक्षार्थी हूं और आपमें एक स्‍पार्क देखकर आपसे कुछ बिन्‍दु सांझे कर लेता हूं । सादर


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Comment by मिथिलेश वामनकर on September 3, 2015 at 5:37pm

इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आदरणीय 

Comment by TEJ VEER SINGH on September 3, 2015 at 5:30pm

आदरणीय रवि प्रभाकर जी,लघुकथा को समय देने के लिये हार्दिक आभार!आप  लघुकथा क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और गुणी जनों में गिने जाते हैं!मैं तो अभी अभी प्रवेश लिया हू!मैं तो महज़ एक प्रशिक्षार्थी हूं!शायद मेरी अपरिपक्वता को आप समझ गये होंगे! आपका कथन शत प्रतिशत सत्य ही होगा, ऐसा मेरा मानना है!आप द्वारा दी गयी बहुमूल्य जानकारी के लिये विशेष रूप से आभार!भविष्य में भी मार्ग दर्शन बनाये रखें!सादर!

Comment by Ravi Prabhakar on September 3, 2015 at 2:57pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी यह लघुकथा न होकर एक प्रेरक प्रसंग हो गया है क्‍योंकि लघुकथा में सीधे सीधे उपदेश देने से गुरेज किया जाता है। आकार व गद्य विधा में समान होते हुए भी लघुकथा व प्रेरक प्रसंग एक दूसरे के विपरित धरातल द्वारा विकसित होतें है । प्रेरक प्रसंग की अभिप्रेरणा उपदेश, आदर्श व प्रचार है जबकि लघुकथा की प्रवृत्‍ित यथार्थ का चित्रण है। प्रेरक प्रसंग अपने गद्य विधान द्वारा एक विशेष शिक्षा व उपदेश प्रस्‍तुत कर संतुष्‍ट हो जाते हैं जबकि लघुकथा समकालीन यथार्थ की परत दर परत विशलेषित या परिभाषित करता है और उसके आगे अकथित के रूप में चुप हो जाता है। सादर ।

Comment by TEJ VEER SINGH on September 3, 2015 at 2:21pm

हार्दिक आभार  आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, जितेन्द्र पिस्टारिया जी,सुशील जी ,ओमप्रकाश जी, धर्मेंद्र जी, तनूजा जी!आप लोगों ने लघुकथा को समय दिया, सराहना की और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियों से मुझे प्रोत्साहित किया, आप सभी का हार्दिक धन्यवाद!

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 3, 2015 at 10:23am
" आपने उनको कल आने का आदेश दिया , इसका तात्पर्य यह हुआ कि आपने काल पर विजय प्राप्त कर ली, आप तो काल-जयी हो गये " अर्थात आपको मालूम है कि आप कल भी उनका काम करने के लिए होंगें और सक्षम होगें।
अर्थात राजा ( या शासन ) कोई भी काम कल पर टालना नहीं चाहिए - इस कथा से तो यही शिक्षा मिलती है पर वर्तमान राजनीति से यह शिक्षा मिलती है कि पहले अपना काम पहले और राज का काम , या जनता का काम खूब पका कर ,चुनाव की स्थिति देख कर क्योंकि जनतंत्र में सरकार पांच साल तो रहती ही है , अर्थात पांच साल के कालजयी तो हुए ही।
बहुत सुन्दर आदरणीय तेज वीर सिंह जी , शायद कोई कुछ सीखे इससे। आपको बधाई , सादर।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 2, 2015 at 9:39pm

वाह! आदरणीय तेजवीर जी. बहुत ही गहन सोच को उजागर की आपने ,लघुकथा के माध्यम से. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें

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