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हिन्दी का अखबार – ( लघुकथा ) -

 हिन्दी का अखबार – ( लघुकथा  ) -

"रणजीत , तुम्हारे घर के फ़ाटक में यह हिन्दी का अखबार लगा हुआ था, कौन पढता है तुम्हारे घर में "!

"पहले बाबूजी पढा करते थे पर अब  कोई नहीं पढता"!

"अंकल को गुजरे हुए  तो सात साल हो गये , फ़िर  क्यों मंगाते हो"!

" बाबूजी के स्वर्गवास के बाद, मम्मीजी  की  इच्छा थी कि यह अखबार उनके जीते जी आता रहे!मम्मीजी रोज़ सुबह  हिन्दी का अखबार, बाबूजी का चश्मा, बाबूजी की चाय उनके कमरे में रख आती थी!उन्हें इससे बडा सकून मिलता था"!

"पर अब तो आंटीजी  भी नहीं रही"!

"हॉ  दीपक, अब तो मम्मीजी  भी चली गयी"!

"फ़िर क्यों मंगा रहे हो यह हिन्दी का अखबार"!

"अब वह सब मैं करता हूं जो मम्मी करती थीं, बडा सकून मिलता है, ऐसा आभास होता है जैसे मॉ बाबूजी आसपास हों और मुझे आशीर्वाद दे रहे हों”!

 मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on September 25, 2015 at 7:18pm

हार्दिक आभार आदरणीय श्री सुनील जी, राजेश कुमारी जी, शशि बंसल जी, आपने लघुकथा को अपना अमूल्य समय दिया, प्रशंसा की,सार्थक टिप्पणी की!पुनः आभार!

Comment by shashi bansal goyal on September 16, 2015 at 8:35pm
बहुत सुन्दर ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 16, 2015 at 8:30pm

दिल छू लेने वाली लघु कथा बहुत ही सुन्दर हार्दिक बधाई आपको आ० तेजवीर सिंह जी 

Comment by shree suneel on September 16, 2015 at 7:33pm
जी हाँ... यादों को ऐसे हीं सहेज कर रखते हैं हम. मर्मस्पर्शी लघु-कथा हुई है. हार्दिक बधाई आपको आदरणीय.
Comment by TEJ VEER SINGH on September 16, 2015 at 7:29pm

हार्दिक आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा "जान"गोरखपुरी जी!आपको लघुकथा अच्छी लगी!शुक्रिया!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 16, 2015 at 6:58pm
गज़ब लघुकथा...!!ह्रदय छू गई..अभिनन्दन!
Comment by TEJ VEER SINGH on September 16, 2015 at 1:18pm

 हार्दिक आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी , मिथिलेश वामनकर जी!लघुकथा को समय देने, सराहने हेतु!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 16, 2015 at 11:58am

बहुत बढ़िया लघुकथा हुई है आदरणीय तेजवीर जी ... हार्दिक बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 16, 2015 at 10:27am

बड़ी ही ऊहात्मक रचना है  क्या अभी सचमुच हमारे अन्दर इतनी संवेदना जीवित है  यदि है तो उसे प्रणाम .

Comment by TEJ VEER SINGH on September 16, 2015 at 9:28am

हार्दिक आभार आदरणीय  कांता रॉय जी!लघुकथा को समय दिया, सराहा,मेरा उत्साह वर्धन किया!शुक्रिया!

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