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अंतहीन अवकाश ( लघुकथा )//शशि बंसल

अंतहीन अवकाश ( लघुकथा )//शशि बंसल
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मुसलाधार बारिश होने के कारण आज अस्पताल से अवकाश ले घर पर ही थी ।काम से फ़ारिग़ हुई तो खिड़की पर आ बैठी ।नीचे झाँका , गली में ज्यादा रौनक नहीं दिखाई दी ।दो-तीन स्कूली बच्चे थे , जो सड़क पर भरे हुए पानी में उछल-कूद करते हुए हँस रहे थे । सामने की दुकानों ने भी ग्राहकी न होते देख आधे शटर गिरा दिए थे । कुछ रिक्शेवाले रिक्शे खाली छोड़ सामने गुमटी पर गरम - गरम चाय की सुड़कियाँ लगा रहे थे । तभी एक रिक्शा गाड़ी आते हुए दिखाई दी, ' अरे ,ये तो माँझी काका हैं ।इतनी बारिश में ......? ' , " माँझी काका..... क्या आज ही मरने की ठान ली है ? पता है न...... दमा जानलेवा हो चुका है..... घर नहीं बैठ सकते थे....इतनी बारिश में सवारी ढोने निकल पड़े ....अब आना दवा लेने .....।" मैं खिड़की से ही चिल्लाई ।

उसने आवाज की दिशा में देखा और बारिश को चीरती हुई तेज़ आवाज में बोला , " डॉक्टर साहिबा , घर तो रात ही में ढह गया , जो चार जीवन बचे हैं ,उन्हें ही ढोने निकला हूँ , आप दवा भले न देना पर दुआ जरूर करना कि अब के मानसून हमें भी लंबी छुट्टी मिल जाये । " माँझी आँसु पौंछते हुए आगे बढ़ गया । बारिश भी अब थम चुकी थी ।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by pratibha pande on October 6, 2015 at 7:44am

आदरणीया शशि जी ,  कथा का शिल्प कसावट लिए है और मर्म दिल को छूने वाला ,बधाई आपको 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 5, 2015 at 8:55pm

नियति के सामने हिदायत  लाचार . आदमी की जिन्दगी  है ही ऐसी . खूबसूरत कथा.

Comment by Sushil Sarna on October 5, 2015 at 7:37pm

मुझे बेहिसाब तिश्नगी देने वाले
मैं क्यों बेहिसाब न पिया करूँ


दिल को मार्मिकता से नाम करती इस लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई। बहुत ही यथार्थपरक चित्रण हुआ है।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 5, 2015 at 6:51pm
आजादी के इतने साल भी गरीब उन्ही जीवनयापन के सवालो में घिरा है..देश में गरीब की स्थिति का वास्तविक चित्रण करती सशक्त लघुकथा पर हार्दिक बधाई आदरणीया।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 3:35pm
मार्मिक चित्रण।बधाई
Comment by kanta roy on October 5, 2015 at 3:20pm

रिक्शेवाले की जिंदगी की जद्दोजद को बखूबी बयान किया है आपने आदरणीय शशि जी।  बधाई स्वीकार करें। 

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