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पुरस्कार ( लघुकथा )// शशि बंसल

चिर प्रतीक्षित पत्रिका का अंक हाथ में आते ही कुसुम ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटने शुरू कर दिए । उसकी दृष्टि विशेष पृष्ठ पर जाकर ठहर गईं । हर्षातिरेक से दौड़कर पापा के पास पहुँची।" पापा , आज मैंने आपका सिर गर्व से ऊँचा कर दिया ।ये देखिये इस प्रतिष्ठित पत्रिका द्वारा आयोजित आलेख प्रतियोगिता में मुझे प्रथम पुरस्कार मिला है और आप हो कि सदा ही मुझे लिखने - पढ़ने से डाँटते रहते हैं । ये तो मम्मी है जो मुझे सदैव प्रोत्साहित करती हैं और लिखने में सहायता करतीं हैं ।"

उन्होंने कुसुम के हाथों से पत्रिका ली और शीर्षक पर दृष्टि डाली " क्यों नहीं स्वीकारता पुरुष स्त्रियों के गुण ..... " पापा उसका आलेख पढ़ रहे थे और वह उनका चेहरा,जिस पर न समझ में आने वाले भाव आ-जा रहे थे। सहसा पापा ने कहा," कुसुम जरा मेरे लिये चाय बना कर लाओ और अपनी माँ को यहाँ भेज दो।"

" क्यों पापा ? "

" क्योंकि तुम्हारी इस सफलता में उसका भी तो हाथ होगा न ? तो पुरस्कार तो उसको भी मिलना चाहिए । "

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 9:36pm
आदरणीया शशि जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 9:34pm
सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई
Comment by pratibha pande on October 7, 2015 at 8:29pm

पिता से मनवा ही लिया माँ का महत्त्व ,इस बेटी ने  बधाई आपको इस सशक्त रचना के लिए शशि जी 

Comment by Omprakash Kshatriya on October 7, 2015 at 7:14pm

आदरणीया शशि जी , बहुत खूब कहा  आप ने इस में जिस का हाथ है पुरुस्कार उसी को मिलाना चाहिए. सुन्दर बधाई. इस सटीक रचना के लिए.

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 6, 2015 at 8:01pm
सुन्दर , कभी - कभी हम बहुत छोटी सी बात बहुत देर में समझ पाते हैं , जैसे इस कथा में आपने दर्शाया है। बहुत बहुत बधाई आदरणीय सुश्री शशी बंसल जी , सादर।
Comment by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 6:46pm

भावपूर्ण लघुकथा  .... हार्दिक बधाई 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 6, 2015 at 5:16pm

हार्दिक बधाई आदरणीय शशि बंसल जी! बहुत अच्छी शिक्षा प्रद लघुकथा!

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