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'ब्लैकमेल'
"अब तो बस करो। पहले ही लाखों रूपए दे चुका हूँ तुम्हें इस मामले को निपटाने के।"
"हा हा....बस दस लाख और।...... उन लोगों को भी तो देने हैं..........जिन्होंने......पूरी योजना बनाई....और उसे..... सफल बनाने में हमारा साथ दिया।"
"देखो इतना ब्लैकमेल करना ठीक नहीं है।किसी शरीफ़ आदमी को झूठे छेड़-छाड़ के मामले में फंसाना और उससे लाखों ऐंठ कर भी उसे चैन से न जीने देना बहुत गलत और बुरा है।और तुम ख़ुद को समाजसेवक कहते हो।"
"ऎसे ही तो समाज सेवा करती है हमारी संस्था 'प्रयास-एक पहल आपके लिए'।"
मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 26, 2015 at 3:50pm

sadar aabhar aadrniy omprkash kshatrya ji utsah vrdhn ke liye

Comment by Omprakash Kshatriya on October 8, 2015 at 8:48am

सतविंदर कुमार  जी लघुकथा  बढ़िया हुई है.

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 10:46pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय सुशील सरना जी।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 10:45pm
बहुत बहुत आभार आदरणीया प्रतिभा पांडे जी ।
Comment by Sushil Sarna on October 5, 2015 at 6:47pm

वर्तमान व्यवस्था पर चोट करती सुंदर लघुकथा हुई है आदरणीय    … हार्दिक बधाई। 

Comment by pratibha pande on October 5, 2015 at 6:21pm

समाज सेवा के नाम पर ऐसी धोखाधड़ी आज कल आम है , सार्थक  विषय लिया है आपने ,बधाई आपकोआदरणीय सतविंदर जी  

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 3:18pm
आभार वन्दनीय Kanta दी हौंसला अफ़जाई के लिए।
Comment by kanta roy on October 5, 2015 at 3:06pm

बढ़िया लघुकथा हुई है आदरणीय सतविंदर  जी। बधाई 

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