For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

निश्छल आराधना की अमर ज्योति महादेवी वर्मा

      आराधना की वेदी पर अपनी हर एक सांस को न्यौछावर कर देने के लिए आतुर महिमायमयी महादेवी की जिंदगी विलक्षण रही। वह प्यार, करूणा, मैत्री और अविरल स्नेह की कवियत्री रही। मधुर मधुर जलने वाली ज्योति जैसी रही प्रतिपल युगयुग तक प्रियतम का पथ आलोकित करने के लिए आकुल रही। अपनी जिंदगी को दीपशिखा के समान प्रज्लवलित करके युग की देहरी पर ऐसे रख दिया कि मन के बाहर और भीतर उजियाला बिखर गया। महादेवी की रहस्यवादी अभिव्यक्ति को निरुपित करते हुए कवि शिवमंगल सिंह सुमन ने कहा था कि उन्होने वेदांत के अद्वैत की छाया ग्रहण की, लौकिक प्रेम की तेजी अपनायी इनको दोनों को एकाकार करके एक निराले ही संबंध को सृजित कर डाला। ऐसा निराला संबंध जोकि मानव मन को आलंबन प्रदान करे और इसे पार्थिव प्रेम से कहीं उपर उठा सके।

      20 वीं सदी की छायावादी हिंदी कविता के चार सर्वश्रेष्ठ कवियों में महादेवी वर्मा को स्थान प्राप्त हुआ । इस श्रंखला के अन्य तीन कवि हैं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत। महादेवी वर्मा को उनकी साहित्यिक रचनाओं के लिए बहुत से पुरुस्कार प्रदान किए गए। इनमे सबसे अधिक उल्लेखनीय रहा सन् 1935 में इंदौर में अखिल भरतीय हिंदी सम्मेलन मे महात्मा गांधी द्वारा प्रदान किया गया ,मंगला प्रसाद पुरुस्कार। सन् 1982 में महादेवी को प्रदान किया गया ज्ञानपीठ पुरुस्कार तथा पद्म भूषण सम्मान। 1983 में तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भारत भारती पुरुस्कार जिसे ग्रहण करते हुए महादेवी ने कहा था कि महात्मा गांधी के हाथों पुरुस्कार पाने के बाद किसी अन्य पुरुस्कार की आकांक्षा नहीं रह गयी थी अतएव उनकी पावन स्मृति में कृतज्ञतापूर्वक यह पुरुस्कार मैं न्यास को समर्पित करती हूं। महादेवी वर्मा एक सतत स्वातंत्रय योद्धा रही। महात्मा गांधी के सशक्त प्रभाव के कारण जीवन पर्यन्त खादी के वस्त्र ही धारण करती रही।

      होली के दिन सन् 1907 में महादेवी का जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ। पिता गोविंद प्रसाद वर्मा अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। मां आध्यात्मिक स्वभाव की महिला थी, जोकि भक्ति आंदोलन के संतो की रचनाओं को प्रायः गाया गुनगुनाया करती थी। महादेवी ने पिता से तीक्ष्ण सजग मेधा पाई तो अपनी मां से संवेदनशील संस्कार ग्रहण किया। इलाहबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम. ए. किया और प्रयाग महिला विद्यापीठ से संबद्ध हो गई। जहां प्रारम्भ में  एक अध्यापक के रूप में और बाद में प्रिंसिपल के तौर पर 30 वर्षों तक कार्यरत रही।

      अपनी काव्य एवं गद्य रचनाओं के अतिरिक्त महादेवी ने प्राचीन भारत के संस्कृत कवियों वाल्मिकी, कालीदास, अश्वघोष, त्यागराज, और जयदेव की कृतियों का हिंदी में पद्यानुवाद भी किया जोकि सप्तपर्ण शीषर्क से प्रकाशित हुआ । महादेवी की संपूर्ण साहित्य साधना वस्तुतः आस्था, उपासना, और उत्सर्ग से लबरेज है। उनकी काव्य रचनाएं नीहारिका, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा उनकी मंगलमय काव्य यात्रा के ज्योर्तिमय पग चिन्ह है और स्मृति की रेखाएं एवं अतीत के चलचित्र प्रमुख गद्य रचनाएं।

 

महादेवी की सबसे पहली काव्य रचना उस पार है । जिसमें उनकी अभिव्यक्ति है...

 विसर्जन ही है कर्णधार

  वही पंहुचा देगा उसपार....

   चाहता है ये पागल प्यार

     अनोखा एक नया संसार ....

       जीवन की अनुभूति तुला पर अरमानों की तोल

         यह अबोध मन मूक व्यथा से ले पागलपन अनमोल

          करे दृग आंसू को व्यापार

            अनोखा एक नया संसार...

 

   नीहार की काव्य रचनाएं सन् 1924 से 1928 के मध्य की हैं

 

अपने उर पर सोने से लिख कर प्रेम कहानी

 सहते हैं रोते बादल तूफानों की मनमानी

 

 नीहार की एक और रचना है

  शूंय से टकरा कर सुकुमार करेगी पीड़ा हाहाकार ...

   विश्व होगा पीड़ा का राग निराशा होगी वरदान

    साथ लेकर मुरझाई साध बिखर जाएगें प्यासे प्राण...

 

 महादेवी के गीतों में सृष्टि के कण कण में व्याप्त संवेदन की यह प्रतीति अपनी सूक्ष्मता एवं सुकुमारता में मर्मस्पर्शी हो उठी है ....

 

जहां विष देता है अमरत्व जहां पीड़ा है प्यारी मीत

 अश्रु हैं नैनों का श्रंगार जहां ज्वाला बनती नवनीत

  जहां बनता पतझार बसंत जहां जागृति बनती उन्माद

   जहां मदिरा बनती चैतन्य  भूलना बनता मीठी याद

 

      साधारणतया समीक्षकों ने महादेवी वर्मा को आधुनिक मीरा के तौर पर अभिहित किया गया है। एक ओर उनकी अगाध संवेदनशीलता बुद्ध की करुणा से अनुप्राणित है तो दूसरी तरफ उनकी वाणी में ऋचाओं की पवित्रता और स्वरों में समगान का सम्मोहन निहित है। उनके इस स्वरुप पर मुग्ध होकर ही महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने  महादेवी के विषय में कहा था...

 

 हिंदी के विशाल मंदिर की वीणा वाणी

  स्फूर्ति चेतना रचना की प्रतिमा कल्याणी

 

 विमुग्ध विभावरी भावना की तीव्रता और गेयता की दृष्टि से महादेवी ने गीतिकाव्य का शिल्प बहुत सुंदर संवारा है

 

मैं नीर भरी दुख की बदली

 विस्तृत नभ का कोई कोना

  मेरा पग पग संगीत भरा

   श्वासों से स्वप्न पराग भरा

    नभ के नवरंग बुनते दुकूल

     छाया में मलय वयार वली ...

      मेरा न कोई अपना होना

       परिचय इतना इतिहास यही

         उमड़ी कल थी मिट आज चली ...

 

      उनकी कविता में रहस्यात्मक अनभूति के साथ करुण वेदना,विरह, मिलन का चित्रण होता रहा। यह कहना कठिन है कि कब उनकी तूलिका से छंद संवर जाते हैं और कब उन ठंदों से रंग बिखर जाते हैं।

 

मैं कंपन हूं तू करुण राग

 मैं आंसू हूं तू है विषाद

  मैं मदिरा हूं तू है खुमार

   मैं छाया हूं तू उसका आधार

    मेरे भारत मेरे विशाल

      मुझको कह लेने दो उदार

       फिर एक बार बस एक बार...

         कहता है जिसका व्यथित मौन

           हम सा निष्फल है आज कौन....

 

   महादेवी के की काव्य धारा में एक अनंत आशावाद समाया है

 

सजल है कितना सवेरा

 गहन तम में जो कथा इसकी न भूला

   अश्रु उस नभ के चढा़ शिर फूल फूला

     झूम झूक झूक कह रहा हर श्वास तेरा

 

 

   महादेवी वर्मा ने अप्रहित आराधना की वेदी पर अपनी प्रत्येक सांस को न्यौछावर कर दिया। वह साहित्य साधना करते करते  स्वयं ही भाव लोक की चलती फिरती संस्कृति बन गई थी। अपने बाल्यकाल से ही महात्मा बुद्ध की करुणा से वह बहुत अधिक प्रभावित रही। उनकी आत्मा पर बुद्ध के दुःखवाद की अमिट छाप सदैव अंकित रही।

 

Views: 685

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by prabhat kumar roy on April 27, 2011 at 8:22am

श्रीमान् वर्मा जी के तर्क से मैं भी पूर्णतः सहमत हूँ कि बहुत से काव्य समीक्षकों द्वारा
महादेवी को आधुनिक मीरा के तौर पर निरुपित करना और उनकी तुलना मीरा से करना
कदाचित उचित नहीं है।

 

Comment by sanjiv verma 'salil' on April 25, 2011 at 10:56pm
पूज्या बुआ श्री पर केन्द्रित सारगर्भित लेख हेतु साधुवाद.

मीरां से बुआ श्री की तुलना भ्रामक है. मीरां के सकल सृजन और जीवन का केंद्र कृष्ण थे. बुआ श्री के साहित्य में राष्ट्रीय, सामाजिक, और दलितोत्थान की चेतना अध्यात्मिक या धार्मिक चेतना की तुलना में अधिक है. मीरां का नैराश्य या पलायन वृत्ति बुआ श्री में तनिक भी नहीं थी. वे अद्भुत जीवट की धनी थीं.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 18, 2011 at 8:36am
आदरणीया महादेवी वर्मा जी से परिचय कराने हेतु बहुत बहुत आभार |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
23 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Monday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service