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surender insan
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surender insan replied to Rana Pratap Singh's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94 सभी ग़ज़लों का संकलन (चिन्हित मिसरों के साथ)
"आपकी मेहनत को तहेदिल से सलाम करता हूं । बहुत बहुत बधाई हो जी । संकलन में मेरी ग़ज़ल को जगह देने के लिए बहुत बहुत आभार जी।"
Apr 30
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदाब आदरणीय समर कबीर साहब जी। बहुत बहुत शुक्रिया जी आपका। "
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"भाई नवीन जी नमस्कार। ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है ।इसे थोड़ा समय देंगे तो और निखर जाएगी।  बहुत बहुत बधाई हो।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीय मोहन जी सादर नमन। ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है। पर अभी बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। वाक्य रचना पर ध्यान दे। सादर।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीया मंजीत जी सादर नमन। ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है जी। बहुत बहुत बधाई हो। गुणीजनों की बातों पे गौर करे जी। लगातार प्रयास करती रहे खुद ब खुद निख़ार आएगा।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीय लक्ष्मण जी सादर नमन। बहुत ही अच्छी गजल आपने कही शेर दर शेर मुबारकबाद पेश करता हूं। मेरे ख्याल से इस ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर यह है। मिलो न हँस के जमाना खराब है साहबभले ही बात हो झूठी उछल तो सकती है।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"फ़रिश्ते वाला शेर सही नही हुआ अभी भी मेरे ख्याल से । अन्यथा न लिजियेगा। सादर।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीय हर्ष जी सादर नमन। आपकी ग़ज़ल पढ़ी ।उस पर आईगुणीजनों की तप्पणीय भी पढ़ी। आपने पीने जो सुधार किया वह भी पढ़ी। आदरणीय बेहतरी की गुंजाइश हमेशा रहती है। बहुत बहुत बधाई हो इस ग़ज़ल के लिए।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीय पँकज जी सादर नमन । ग़ज़ल क प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करे जी।"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"1212 1122 1212 22 किसी तरह की मुसीबत हो टल तो सकती है। सँभलने की कोई सूरत निकल तो सकती है।। तलाश करने पे इंसानियत नहीं मिलती।मगर उमीद कोई साथ चल तो सकती है।। ये मानता हूं नयी नस्ल है भटक जाती।करे अगर कोई कोशिश सँभल तो सकती है।। फ़िराक़ ने भी ये…"
Apr 28
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीय बासुदेव जी सादर नमन । ग़ज़ल का प्रयास बहुत अच्छा हुआ है बहुत बहुत मुबारकबाद।"
Apr 27
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"जनाब अफरोज साहब आदाब। ग़ज़ल के बेहतरीन प्रयास के लिए बहुत बहुत मुबारक़बाद कबूल करे जी।"
Apr 27
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आदरणीय मुनीष जी सादर नमन जी। ग़ज़ल का बहुत अच्छा प्रयास हुआ है दिली बधाई स्वीकार करे जी ।"
Apr 27
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"    जनाब तस्दीक़ अहमद साह्ब आदाब। बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद  के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Apr 27
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"जनाब शिज्जु शुकूर साहब आदाब। ग़ज़ल का बेहतरीन प्रयास हुआ है दिली मुबारक़बाद कबूल करे जी।"
Apr 27
surender insan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-94
"आद. अंजली जी सादर नमन। ग़ज़ल का आपका प्रयास बेहतरीन है। बाकि भाई नीलेश जी बता ही चुके है। इनकी बातो पे गौर करियेगा। सादर जी।"
Apr 27

Profile Information

Gender
Male
City State
sirsa (haryana)
Native Place
india
Profession
self work
About me
a simple parson. give respect take respect .always be happy & let others be happy.

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ग़ज़ल "एक दिन मिल जायेगा सब ख़ाक में"

*२१२२ २१२२ २१२*

हर जगह रहता है अपनी धाक में।

ख़ासियत देखी ये उस चालाक में।।

चीज कोई मुफ़्त में कैसे मिले।

लोग रहते आजकल इस ताक में।।

आदमी करता गुमाँ किस बात का।

एक दिन मिल जायेगा सब ख़ाक में।।

ख़ुद-ब-ख़ुद सम्मान मिलता आजकल।

आप हो जब कीमती पोशाक में।।

जब न मोबाइल किसी के पास था।

लोग लिखते हाल अपना डाक में।।

डर हमेशा उस ख़ुदा से ही लगे।

मैं नहीं रहता किसी की धाक…

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Posted on March 28, 2018 at 3:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल "कहता हूँ अब ग़ज़ल मैं उसे सोचते हुए"

  

221 2121 1221 212

इंसानियत के तंग सभी दायरे हुए।

दिखते नहीं हैं लोग जमीं से जुड़े हुए।।

जो सुर्खियों में रहते हमेशा बने हुए।

रहते है लोग वो ही ज़ियादा डरे हुए।।

आहट हुई जरा सी बुरे वक़्त की तभी।

कुछ साँप आस्तीन से निकले छुपे हुए।।

वो इस लिये खड़ा है बुलन्दी पे आज भी।

डरता नहीं है झूठ कोई बोलते हुए।।

ख्वाबों में देखता हूँ जिसे रोज रात में।

कहता हूँ अब ग़ज़ल मैं उसे सोचते…

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Posted on March 11, 2018 at 4:00pm — 28 Comments

ग़ज़ल " ग़मो का इक समंदर टूटता है।"

1222 1222 122

ग़मो का इक समंदर टूटता है।

किसी का भी अगर घर टूटता है।।

मिले धोख़े पे धोख़ा जब किसी को।

तो वो अंदर ही अंदर टूटता है।।

सँभलता मुश्किलों से आदमी फिर।

भरोसा जब कहीं पर टूटता है।।

करो कोशिश भले तुम लाख यारो।

न आईने से पत्थर टूटता है।।

उजड़ते है परिंदों के कई घर।

कभी कोई भी खण्डहर टूटता है।।

यही तक़दीर में शायद लिखा हो।

जो देखूं ख़्वाब अक्सर टूटता है।।

ग़ज़ल…

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Posted on January 24, 2018 at 9:30am — 10 Comments

ग़ज़ल "ऐसे भी माहौल बनाया जाता है"

22 22 22 22 22 2



रिश्ता जो इक बार बनाया जाता है।

वो फिर सारी उम्र निभाया जाता है।।

ऐसे भी माहौल बनाया जाता है।

कुछ होता कुछ और दिखाया जाता है।।

ऐसा देखा यार सियासत में अक्सर।

इक दूजे को चोर बताया जाता है।।

सच हो पाए जो न किसी भी सूरत में।

क्यों अक्सर वो ख़्वाब दिखाया जाता है।।

 रंग बदलते गिरगिट सा कुछ लोग यहाँ।

मतलब हो तो प्यार जताया जाता है।।

ये सच्चाई तो जग जाहिर है यारो।

जो…

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Posted on January 12, 2018 at 2:30pm — 11 Comments

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At 11:48pm on July 7, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

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 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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