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"किसी के साथ भी धोखा नहीं करतें"

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सुकूँ वो उम्र भर पाया नहीं करतें।
बड़ों की बात जो माना नहीं करतें।।

बुजुर्गों की नसीहत ये पुरानी है।
बिना सोचे कभी बोला नहीं करतें।।

सफल होते हमेशा लोग वो ही जो।
किसी की बात सुन बहका नहीं करतें।।

जिन्हें आदत हमेशा जीतने की हो।
वो मैदां छोड़ कर भागा नहीं करतें।।

हमेशा से रहा इक ही उसूल अपना।
किसी के साथ भी धोखा नहीं करतें।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by surender insan on December 13, 2018 at 9:33am

जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय राज नवादवी साहब। सादर नमन।

Comment by surender insan on December 13, 2018 at 9:32am

जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब। सादर नमन जी।

Comment by surender insan on December 13, 2018 at 9:30am

जी आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमन। बहुत बहुत शुक्रिया आपका। वह मिसरा बदल दिया है देखियेगा। सादर जी।

Comment by surender insan on December 13, 2018 at 9:29am

जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय तेजवीर जी । सादर नमन।

Comment by surender insan on December 13, 2018 at 9:28am

जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । सादर नमन जी।

Comment by राज़ नवादवी on December 12, 2018 at 8:06pm

आदरणीय सुरेंद्र इंसान साहब, आदाब। सुंदर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे बधाई। सादर।।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 12, 2018 at 5:08pm

जनाब सुरेन्द्र इंसान साहिब  , अच्छीग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l मुहतरम समर साहिब का कहना सही है , ज़ाया शब्द के आखिर में उर्दू के हिसाब से अलिफ नहीं बल्कि एन है इस ग़ज़ल में यह क़ा फिया नहीं होगा l

शेर यूँ कर सकते हैं (सफ़ल वो लोग होते हैं हमेशा __समय बर्बाद जो अपना नहीं करते) 

Comment by Samar kabeer on December 12, 2018 at 2:49pm

भाई लक्ष्मण धामी जी,मेरी टिप्पणी स्पष्ट है,आपने ध्यान से नहीं पढ़ी शायद,इस शब्द का सहीह तलफ़्फ़ुज़(उच्चारण)"ज़ाए" है न कि 'ज़ाया'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 1:28pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । आपकी टिप्णी में ज़ाया शब्द को काफिया के तौर पर न लेने की सलाह से उलझन में हूँ । यह शब्द यहाँ अर्थ के हिसाब से ठीक नहीं है या किसी और वजह से मार्गदर्शन करें । मेरे हिसाब से यह यहाँ बरबाद के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है न कि जाने के । आप शंका समाधान कीजिएगा । शेष शुभ शुभ.. 

Comment by Samar kabeer on December 12, 2018 at 11:13am

जनाब सुरेन्द्र इंसान जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

जरा सा वक़्त भी ज़ाया नहीं करतें'

इस मिसरे में "ज़ाया" क़ाफ़िया सहीह नहीं है,सहीह शब्द है "ज़ाए",जिसे आम तौर पर लोग "ज़ाया" बोलते हैं,देखियेगा ।

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