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एम॰ बी॰ ए॰ बहू -( लघुकथा )-

सुनयना की शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे कि उसकी सास का फ़ोन आगया,"समधन जी, ज़रा फ़ुरसत निकाल कर अपनी लाडली को ले जाना"! और आगे बिना कुछ कहे सुने फ़ोन काट दिया!शाम को सुनयना के मॉ बापू पहुंच गये उसके ससुराल!

"कोई भूल हो गयी क्या हमारी सुनयना से"!

"नहीं जी, भूल तो हमसे हुयी जो इसकी भोली सूरत और एम. बी. ए. की डिग्री से धोखा खा गये"!

"आखिर हुआ क्या, बहिनजी, कुछ बताइये तो सही"!

"कोई एक बात हो तो बतायें! बिना उठाये सुबह उठती नहीं, महारानीजी, बिस्तर पर ही चाय चाहिये,रसोई के काम से सख्त परहेज़,राजू के आफ़िस जाते ही कमरा बंद कर ए. सी. चलाकर टी .वी. और लैप टॉप से चिपक जाना!दोपहर का खाना ,शाम की चाय और रात का खाना भी कमरे में!सास ससुर से कोई वास्ता ही नहीं"!

"असल में इकलौती संतान थी तो थोडा लाड प्यार में पली है"!

"हम नहीं दे सकते इतना लाड प्यार,बेहतर यही होगा कि इसे आप ले जाइये और इसे माटी की बन्नो से एक सुघड बहू बना कर ही वापस लाइये"!

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Archana Tripathi on October 16, 2015 at 1:08am
स्त्री के कमजोर पक्ष को दर्शाती बढ़िया लघुकथा ।स्त्री अपने स्त्रियोचित गुण भुल कर सम्मान नहीं पा सकती ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:36am
आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी, मेरे विचार से कथा में एम. बी. ए. डिग्री पर ताना इसलिए मारा गया है कि बहू घर का मैनेजमेंट तक तो सही तरीके से संभाल नहीं रही है, केवल मोबाइल, गेम, नेट जैसी चीजों में व्यस्त रहकर रिश्तों का मैनेजमेंट भी सही ढंग से नहीं कर पा रही है। यहां नौकरी का संदर्भ है ही नहीं।सादर क्षमा सहित।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 14, 2015 at 10:06pm

हार्दिक आभार आदरणीय डॉ विजय शंकर जी!आपने लघुकथा को समय दिया !विस्तार से विवेचना की!कमज़ोर पक्ष उजागर किया!शायद नयी ज़गह पर व्याह कर आये बहू को तीन महीने ही हुए थे तो हो सकता है जॉब की तलाश में हो!कुछ परिवार ऐसे भी होते हैं कि बहु तो शिक्षित चाहिये मगर जोब नहीं करायेंगे!आपका पुनः आभार!

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 14, 2015 at 7:04pm
बहू एम बी ए है , पर जॉब में नहीं है , कुछ अटपटा सा नहीं लगता है। यह कहानी का कमजोर पक्ष बन रहा है।
दूसरी बात - हम एक चीज़ हासिल कर दूसरी तमाम चीज़ें छोड़ देते हैं , दुनिया में हम ही शायद ऐसे हैं. वरना घर - परिवार चलाना किस स्त्री- पुरुष को नहीं आता , सोचना या स्वीकार करना कठिन हो जाता है। उच्च - शिक्षा का यह मतलब तो बिलकुल नहीं है कि जिंदगी की बुनियादी आवश्यकताओं को बिलकुल विस्मृत कर दिया जाए। इस पक्ष को उठाने के लिए , बधाई, आदरणीय तेज वीर सिंह जी , सादर।
Comment by TEJ VEER SINGH on October 14, 2015 at 2:05pm

हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी जी!लघुकथा को अपना अमूल्य समय दिया, सराहना की ,साथ ही कितनी बारीकी से विशलेषण किया!पुनः आभार!

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2015 at 1:25pm
मनोविज्ञान का समुचित ज्ञान तीन स्तर पर बुरी स्थिति में है-1-माँ-बाप, 2- सास-ससुर, 3- बेटी/बहू ......[1]- माँ-बाप इकलौती संतान का व्यक्तित्व बिगाड़ते हैं, [2]- दहेज़ /खूबसूरती/उच्च शिक्षा की लालच में इकलौती बेटी को बहु बना कर लाने वाले सास-ससुर को तमीज़ नहीं होती उसके मनोविज्ञान को समझने की, [3]-- ऐसी बेटी/बहू को ससुराल वालों के साथ मनोवैज्ञानिक तालमेल जमाने की तमीज़ नहीं होती। आशय यह कि सभी जब दोषी हों तो सज़ा क्यों, शोषण-अन्याय क्यों? ये सवाल उठा रही है आपकी रचना आदरणीय Tej Veer Singh जी। बधाई

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