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“और भाईजान कैसे है...सब खैरियत तो हैं न?” चिकन शॉप में काम करने वाले प्रकाश के मित्र जावेद ने शिष्टाचार के तहत पूँछा ।

“बस, रहम हैं ऊपर वाले का..और तुम्हारी कैसी गुजर रहीं है, बड़े दिन बाद आना हुआ ईधर ।” प्रकाश ने कहा ।

“बस, काम के सिलसिले में दिल्ली गया था कल ही तो लौटा हूँ...सोचा प्रकाश भाई कि शॉप से चिकन लेता आऊँ वैसे भी बड़े दिन हो गये तुम्हारे दुकान का चिकन खाए हुए ।” जावेद ने जवाब देते हुए कहा ।

“हाँ...हाँ, क्यों नहीं ।” प्रकाश ने कहा ।

“अरे! यार प्रकाश तुम भी आ जाना शाम को दुकान को बढ़ाने के बाद...बढ़ियाँ मिल बैठकर पार्टी कि जाएगी वैसे भी अब्बू, अम्मी हैदराबाद खाला के घर गये है ।” जावेद ने उत्तेजना भरे लहेजे में कहा ।

“भाईजान माफ करना यार मैं शाकाहारी हूँ...ये चिकन, मटन मुझसे नहीं खाया जाता ।” और इतना कहकर प्रकाश ने मुर्गे कि गर्दन को नश्तर से उड़ा दिया ।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by DIGVIJAY on October 22, 2015 at 12:46pm
आदरणीया कान्ता रॉय जी यही इस समाज कि विसंगति हैं कि चोर चोरी करने से मना करता हैं....कत्ली कत्ल करने से...अक्सर यहाँ पर उपदेश गलत व्यक्ति द्वारा ही दिये जाते हैं..।।
यद्यपि सच्चाई यह हैं कि उपदेश देना श्रेष्ठ जनों का कार्य हैं सर्व जनों का नहीं । सादर
Comment by DIGVIJAY on October 22, 2015 at 12:43pm
आदरणीय ओमप्रकाश जी मैं अवश्य ही मिथिलेश जी के सुझाव पर गौर करँगा....वैसे आपका अार्शीवाद मिला मन प्रसन्न हुआ...।।
Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 6:53am
चिकन विक्रेता का शाकाहार होना , एक चिंतन एक मनन दे गया । खाने वाला और काटने वाला ....... शाकाहार एक विभत्स विसंगति । ढेरों बधाई आपकी इस सार्थक लघुकथा के लिये आदरणीय दिग्विजय जी ।
Comment by Omprakash Kshatriya on October 21, 2015 at 8:00pm

आदरणीय DIGVIJAY जी मिथिलेश वामनकर जी ने बहुत ही उम्दा सुझाव दिया है. इस पर जरुर गौर कीजिएगा. वैसे आप की लघुकथा जानदार हुई है. बधाई .

Comment by DIGVIJAY on October 21, 2015 at 6:46pm

जी आपने मेरी लघुकथा पर अपना ध्यान दिया इसके लिए आपको धन्यवाद....मैं अवश्य ही आपके द्वारा सुझाए शीर्षक का चुनाव करूँगा..सादर ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 21, 2015 at 3:11pm

आदरणीय दिग्विजय जी, आपकी किसी पहली प्रस्तुति से गुजर रहा हूँ. बहुत बढ़िया लघुकथा हुई है. आपको हार्दिक बधाई. 

मेरे मन में विचार आया लघुकथा का शीर्षक शाकाहारी की बजाय विडम्बना या ऐसा ही और कुछ होता हो लघुकथा और मारक बन पड़ती क्योकि शीर्षक पढने के पाब लघुकथा की दों शुरुआत करते ही अंत का अनुमान भी लग जाता है जिससे पाठक को वो झटका नहीं लगता जो अपेक्षित है. सादर 

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