For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ज़मीर – ( लघुकथा ) -

  ज़मीर – ( लघुकथा ) -

गोपाल ने जैसे ही मेट्रो से बाहर निकलकर मोबाइल के लिये जेब में हाथ डाला!मोबाइल गायब था!उसके हाथ पैर फ़ूल गये!उसका सब कुछ ही मोबाइल में था!उसने क्या करना है ,कहां जाना है , उसके सारे कागज़ात की प्रतियां सब मोबाइल में ही थी!उसे कुछ नहीं सूझ रहा था!

तभी सामने उसे पी.सी.ओ. दिखा!उसने तुरंत अपना मोबाइल नंबर मिलाया!दूसरी ओर से आवाज़ आयी,हैलो, "आप कौन"!

"आप कौन हो भाई "!

"कमाल है भाई, फ़ोन आपने मिलाया है तो आप बताओ ना कि आप कौन हो"!

"देखो भाई, आप जो भी हो,मैं सिर्फ़ यह विनती  करना चाह्ता हूं कि जिस फ़ोन से आप बात कर रहे हो वह मेरा है!मेरे इसमें कुछ ज़रूरी मैसेज,डेटा और नंबर हैं!आप इसके बदले मुझसे  जितने चाहो पैसे ले लो,पर ये फ़ोन वापस दे दो"!

"कितने पैसे दोगे"!

"आप बताओ,कितने चाहिये"!

"चलो ठीक है ,तुम मेट्रो  स्टेशन के बाहर स्कूटर स्टैंड के गेट  पर आ जाओ,मैंने नीली जीन्स और लाल टी शर्ट पहन रखी है"!

गोपाल दौडता हुआ बताई ज़गह पर पहुंच गया!वह आदमी भी वहीं पर   मिल गया!उसने मोबाइल गोपाल को दे दिया!

गोपाल ने पूछा,"भाई कितने पैसे"!

"यार मैं कोई जेबकतरा नहीं हूं!तुम्हारा मोबाइल मेट्रो में गिर गया था!मैंने उठाया तब तक तुम गायब हो गये"! 

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 475

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by TEJ VEER SINGH on October 22, 2015 at 1:41pm

हार्दिक आभार आदरणीय ओमप्रकाश जी, कांता जी, गणेश बागी जी!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 22, 2015 at 9:13am

सकरात्मक सोच की परिणति है यह लघुकथा, सुन्दर सन्देश एक अच्छी लघुकथा जन्म ली है, बहुत बहुत बधाई आदरणीय तेजवीर सिंह जी.

Comment by kanta roy on October 22, 2015 at 1:47am
पुर्वाग्रह से ग्रसित मन आशंका से डरा हुआ और ऐसे में एक सकारात्मक परिस्थिति का सामना करता है तो इंसानियत का वजूद जैसे फिर से साकार हो उठता है । बहुत खूब लघुकथा हुई है आपकी आदरणीय तेजवीर जी । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Omprakash Kshatriya on October 21, 2015 at 7:56pm

आ भाई  TEJ VEER SINGH जी मैं ने एक  बार पहले भी कहा था. फिर दोबारा कहा रहा हूँ. क्या करूं ? कहे बिना रहा नहीं जा रहा है. आजकल आप को क्या होता जा रहा है. आप की लेखनी, आप की सोच और आप का तजुर्बा सब गजब ढा रहे है. दिन ब दिन आप की लेखनी में गजब का निखार आ रहा है. बधाई इस लघुकथा के लिए.

Comment by TEJ VEER SINGH on October 21, 2015 at 7:03pm

हार्दिक आभार आदरणीय राहिला जी!

Comment by TEJ VEER SINGH on October 21, 2015 at 7:02pm

हार्दिक आभार आदरणीय मिथिलेश जी!यह आपकी दरियादिली है कि आपको लघुकथा पसंद आयी!

Comment by Rahila on October 21, 2015 at 4:02pm
बहुत अच्छी रचना आद.तेजवीर जी!ईमानदारी अभी बाकी है दुनिया में ।बहुत बधाई आपको ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 21, 2015 at 3:46pm

आदरणीय तेजवीर जी हलकी फुलकी सी, सादगी भरी और बहुत ही साधारण कथ्य के बावजूद लघुकथा बेहद प्रभावकारी  हुई है. ये लघुकथाकार के शिल्प और लेखनी का कमाल है. बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday
Sushil Sarna posted blog posts
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service