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मन में हो विश्वास अगर।

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं,

कीचड़,मटमैले जल में भी,फूल कमल के खिलते हैं।

घोर घने अंधियारे में ही, तारे झिलमिल करते हैं।

पत्थर तो बस पत्थर है, पत्थर का कोई मोल नहीं,

दुख सहकर मूरत बनता है,होता है अनमोल वही,

धूप,दीप,नैवेद्य चढ़ा,लाखों सिर सजदे करते हैं।

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं।

अपना अस्तित्व बचाने को,खाक में दाना मिलता है,

सर्दी,बारिश की बूंदें,गर्मी की चुभन को सहता है,

हृदय चीर कर धरती का तब कोमल पौधे बनते हैं।

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं।

जीवन के पथ दुर्गम हैं, दुर्गम पथ के वीर बनो,

ऊँची चोटी के शिखर बनो,बहती नदिया के नीर बनो,

अविराम,निरंतर मानुष ही, फल जीवन के चखते हैं,

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं।

अजय शर्मा " अज्ञात "

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Kumar Sharma on October 23, 2015 at 6:45pm

आदरणीय मिथलेश जी एवं दिग्विजय जी अनेकानेक धन्यवाद।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 22, 2015 at 11:41pm

आदरणीय अजय जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति 

इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by DIGVIJAY on October 22, 2015 at 5:10pm

जीवन के पथ दुर्गम हैं, दुर्गम पथ के वीर बनो,

ऊँची चोटी के शिखर बनो,बहती नदिया के नीर बनो,

अविराम,निरंतर मानुष ही, फल जीवन के चखते हैं,

मन में हो विश्वास अगर,दीप आस के जलते हैं।

.

सुन्दर रचना हुई हैं बधाई स्वीकार करें ।

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